प्रकृति के रंग सुमित्रानंदन पंत के संग

प्रकृति के रंग सुमित्रानंदन पंत के संग

प्रकृति के महान कवि सुमित्रानंदन पंत का रचा हुआ संर्पूण साहित्य ‘सत्यम शिवम् सुंदरम’ के आदर्शो से प्रभावित होते हुए भी समय के साथ निरतंर बदलता रहा है

डॉ मंजू पांडे

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हिन्दी साहित्य एक वृहत साहित्य है जिसमें अनेक कवियों लेखकों ने अपनी लेखनी से हिन्दी साहित्य को गौरव प्रदान किया। इन्हीं कवियों और लेखकों में छायावादी युग के प्रमुख कवि सुमित्रानंदन पंत थे। उन्हंे छायावाद के चार स्तम्भों में से एक माना जाता है। बींसवीं सदीं का पूर्वाद्ध छायावादी कवियों का उत्थान काल था। सुमित्रानंदन पंत उस नये युग के प्रवर्तक के रूप में हिन्दी साहित्य में उदित हुए। पंत का प्रकृति चित्रण सर्वश्रेष्ठ है। इसका कारण उनका जन्म ही बर्फ से आच्छादित पर्वतों की अत्यन्त आकर्षक घाटी अल्मोड़ा में हुआ। झरना ,बर्फ, पुष्प, लता, भंवर, गुजंन, किरण सब सहज रूप से उनके काव्य का हिस्सा बनें।

सुमित्रानंदन पंत का जन्म अल्मोड़ा जिले के कौसानी नामक ग्राम में 20 मई 1900 में हुआ था। उनके जन्म के छः घन्टे बाद ही उनकी माॅं का निधन हो गया। पंत जी का लालन पालन उनकी दादी ने किया। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा अल्मोड़ा में हुई। उनके बचपन का नाम गुसाई दत्त था जिसे उन्होंने बदल कर सुमित्रानंदन कर लिया। सन् 1918 में वे अपने मझले भाई के साथ काशी चले गए, वहाॅं से मैट्रिक करने के बाद पंत जी इलाहाबाद चले गए। इलाहाबाद के म्योर कालेज में उन्हेंानें इन्टर में प्रवेश लिया परन्तु गाॅंधी जी के आवाहन पर उन्हाने पढा़ई बीच में ही छोड़ दी और घर पर ही रह कर हिन्दी अग्रेंजी, बंग्ला, संस्कृत का अध्ययन करने लगे।

सुमित्रानंदन पंत जब चैथी कक्षा में पढ़ रहे थे तभी कविता करने लगे। 1907 से 1918 के काल को स्वयं कवि ने अपने कविे जीवन का प्रथम चरण माना है। इस काल की कविताएं ‘वीणा’ में संकलित है। सुमित्रानंदन पंत की अन्य प्रमुख कृतियाॅं है ग्रंथि, गुंजन, युगांत, स्वर्ण किरण, स्वर्ण धूलि, कला और बूढ़ा चाॅंद, लोकायतन, निदेबरा, सत्यकाम आदि है। सुमित्रानंदन पंत की सबसे अधिक कलात्मक कविताएं ‘पल्लव’ में संकलित है। जो 1918 से 1925 तक लिखी गई, यह 32 कविताओं का संग्रह है।

सुमित्रानंदन पंत मूलतः प्रकृति के कवि है और प्रकृति के सभी रंगो को उन्हांेनें अपनी कविता का अंग बनाया। इसका प्रमुख कारण प्रकृति की गोद में उनका जन्म होना माना जा सकता है।

वे अपनी कविता ‘मौन निमंत्रण’ में लिखते है –

स्तब्ध ज्योत्सना में जब संसार;  चकित रहता शिशु सा नादान,
विश्व के पलको पर सुकुमार;  विचरते है जब स्वप्न अजान
न जाने, नक्षत्रों से कौन; निमंत्रण देता मुझको मौन!
सघन मेंघों का भीमाकाश; गजरता है जब तमसाकार,
दीर्घ भरता समीर निःश्वास; प्रखर ; झरती जब पावस धार
न जाने, तपक तडि़त में कौन; मुझे इंगित करता तब मौन
देख वसुधा का मानव भार ;  गूंज उठता है जब मधुमास,
विधुर उर के से मृदु उद्गार ; कुसुम जब खुल पड़ते सोच्छ्वास
न जाने सौरभ के मिस कौन ; संदेशा मुझे भेजता मौन!

स्ुामित्रानंदन पंत खेतो को देखकर लिखते है कि-
रोमांचित सी लगती वसुधा; आई जौ, गेहूं में बाली
अरहर सनई की सोने की ; किन्किनियाॅं है शोभाशाली,
उडती भीनी तैलाक्त गंध ; फूली सरसों पीली-पीली
लो हरित धरा से झांक रही ; नीलम की कलि तीसी नीली

एक तरफ जहाॅं सुमित्रानंदन पंत खेतों में लहलहाती फसलों का वर्णन करते है तो दूसरी तरफ वे फलों से लदे पेड़ों का वर्णन भी सजीव लगता है-

अब रजत स्वर्ण मंजरिओ से ; लद गयी आम तरू की डाली
झर रहे ढाक, पीपल के दल ; हो उठी कोकिला मतवाली
महके कटहल, मुकुलित जामुन ; जंगल में झरवेरी झूली
फूले आडू, नीम्बू, दारिम ; आलू, गोभी, बैंगन, मूली
 
पंत जी अपने ‘पल्लविनी’ संग्रह की ‘बादल’ कविता में लिखते है –

सुरपति के हम है अनुचर ; जगत्प्राण के भी सहचर;
मेघदूत की सजल कल्पना; चातक के चिर जीवनधर;
मुग्ध शिखि के नृत्य मनोहर, सुभग स्वाति के मुक्ताकार;
विहग वर्ग के गर्भ विधायक, कृषक बालिका के जलधर

कवि की कल्पना भी विशाल होती है सुमित्रानंदन पंत की कल्पना भी विशाल है वे एक चींटी को देख कर भी कविता करते है ।

पंत जी चींटी जैसे छोटे प्राणी पर भी कविता कर सकते है वे अपनी ‘चींटी’ कविता में चींटी के अनवरत परिश्रम का वर्णन करते हुए लिखते है-

चींटी का देखा ? वह सरल, विरल, काली रेखा
तम के तागे सी हिल डुल
चलती लघु पद पल पल मिल जुल,
यह है पिपीलिका पाॅंति ! देखो ना किस भॅंाति
काम करती वह सतत, कन-कन कनके चुनती अविरत
स्ुमित्रानंदन पंत का जन्म प्रकृति के आॅंचल में हुआ इसलिए उनकी कविताओ में हम प्रकृति के रंगों को आसानी से देख सकते है।

वे अपनी कविता ‘नौका विहार’ में लिखते है-

शांत स्निग्ध, ज्योत्सना धवल! अपलक अंनत, नीरव भूतल
सैकत शयया पर दुग्ध धवल, तन्वंगी गंगा, ग्रीष्म- विरल
लेटी है श्रान्त, क्लान्त, निश्चल! तपस बाला गंगा, निर्मल,
शशि- मुख में दीपित मृदु करतल ; लहरे उर पर कोमल कुंतल!
गोरे अंगों पर सिहर- सिहर ; लहराता तार तरल सुन्दर
च्ंाचल आंचल सा नीलाम्बर ! साड़ी की सिकुडन सी जिस पर,
शशि की रेशमी विभा से भर ; सिमटी है वर्तुल, मृदुल लहर

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इस प्रकार छायावाद के इस कवि ने प्रकृति के लगभग सभी रंगो का सजीव चित्रण किया जिसे शब्दों में समेटना मुश्किल है। सुमित्रानंदन पंत छायावाद के प्रमुख कवि थे। इस युग को जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’, रामकुमार वर्मा जैसे छायावादी प्रकृति उपासक सौन्दर्य पूजक कवियों का युग माना जाता है, और इस युग के ही प्रमुख कवि है सुमि़ानंदन पंत जिन्हें हम प्रकृति के कुशल चितेरे भी कहते हैं। पंत जी को हिन्दी साहित्य की अनवरत सेवा के लिए अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया गया। सन् 1961 में पंत जी को ’पद्मभूषण’ से नवाजा गया। ‘चिदम्बरा’ नामक रचना के लिए सुमित्रानंदन पंत को 1968 में ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला। ‘कला और बूढा चाॅंद’ के लिए 1960 का ’साहित्य अकादमी ’ पुरस्कार सुमित्रानंदन पंत को मिला। पंत जी को  ’सोवियत लैंड नेहरू ’ जैसे पुरस्कारों और सम्मानों से भी अलंकृत किया गया ।

प्रकृति के इस महान कवि ने 28 दिसम्बर सन् 1977 इलाहाबाद उत्तर प्रदेश से इस संसार से विदा ले ली ,परन्तु उनका साहित्य आज भी हमारे बीच जीवन्त है। कौशानी स्थित सुमित्रानंदन पंत के पुराने घर को आज ‘सुमित्रानंदन पंत वीथिका ’ के नाम से एक संग्राहलय बना दिया गया है। इस स्थल के प्रवेश द्वार से लगे भवन की छत पर महाकवि की मूर्ति स्थापित है। संग्राहलय में महाकवि पंत द्वारा उपयोग में लाई गई दैनिक वस्तुएं जैसे शाल, दीपक, पुस्तकों की अलमारी तथा महाकवि को समर्पित कुछ सम्मान पत्र एवं पुस्तकें तथा हस्तलिपि सुरक्षित है। उनका रचा हुआ संर्पूण साहित्य ’सत्यम शिवम् सुंदरम ’ के आदर्शो से प्रभावित होते हुए भी समय के साथ निरतंर बदलता रहा है। सुमित्रानंदन पंत सदा ही अत्यन्त सशक्त और उर्जावान कवि रहें हैं। पंत जी वास्तव में मानव सांैन्दर्य और आध्यात्मिक चेतना के भी कुशल कवि थे। छायावादी इस कवि के रचना कर्म में आधुनिक हिन्दी कविता का पूरा एक युग समाया हुआ है।


डॉ मंजू पांडेय ने लखनऊ विश्वविद्यालय से पीएचडी किया है। वह विभिन्न प्रकाशनों के लिए नियमित रूप से योगदान करती हैं

2 Comments

  1. King April 19, at 11:20

    It is superb . Thank you for such beautiful poems.

    Reply
  2. King April 19, at 11:21

    . Thank you for such beautiful poems. They are superb.

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