कसकै जाणू द्वाराहाटा…

कसकै जाणू द्वाराहाटा…


कहते हैं भगवान श्रीकृष्ण मथुरा पर होने वाले आक्रमणों से जब तंग आ चुके थे तब उन्होंने सुदूर हिमालय की श्रृखंला में द्वारका बसाने की सोची, द्वाराहाट को उस समय की द्वारका कहा जाता है


मदन थपलियाल


क निमंत्राण पर मैं और राजस्व सेवा से सेवानिवृत्त भाई महेश्वर नैथाणी के साथ अल्मोड़ा के द्वारहाट में आयोजित स्यालदे और बिखौती मेले में सम्मिलित होने का अवसर मिला। मेले में सम्मिलित होना था इसलिए सोचा कि क्यों न इसकी डाक्यूमेंटरी फिल्म तैयार की जाए, अतः हमने अपने ही एक मित्रा पी.सी. अग्रवाल जो दूरदर्शन के लिए भी काम करते थे और कई डाक्यूमेंटरी फिल्म बना चुके हैं, को भीे अपने साथ ले लिया।


दिल्ली से तीन बजे निकले तो रात रामनगर में बितानी पड़ी। अगले दिन सुबह हम द्वारहाट के लिए निकल पड़े। हमारा वाहन जिम कार्बेट पार्क के बीचों-बीच चलता हुआ पहाड़ों पर चढ़ने लगा। लम्बा पहाड़ी रास्ता पार करने के बाद हम रानीखेत पहंुच गए। यहां का सुरम्य वातावरण बहुत ही मनमोहक था। चारों ओर हरियाली और चीड़ के गगन चुम्बी वृक्ष, उनसे छूकर चलने वाली मंद वयार यहां आने वालों को मदमस्त कर देती है। आखिर दोपहर बाद तीन बजे तक हम द्वारहाट पहंुच ही गए।


यहां के स्थानीय लोगों जिनमें उत्तराखंड क्रांति दल के विधयक पुष्पेश त्रिपाठी भी थे ने हमारे आगमन पर खुशी जताई। तब वहां एक स्कूल में सांस्कृतिक कार्यव्रफम चल रहा था, उन लोगों के आग्रह पर हम उस सांस्कृतिक कार्यव्रफम में सिरकत करने चले हमारे रहने का इंतजाम द्वारहाट के डाक बंगले में किया गया था। यहां से हिमालय पर्वत श्रृखंला के मनोहारी दर्शन होते हैं। यहां चीड़ और बंुरास के पेड़ों से टकरा कर आने वाली हवा ठंडक पैदा करने के साथ-साथ आगन्तुक को भाव विभोर कर देती है।


रात्राी के समय ऐसा लगता है कि आकाश के तारे ध्रती के कापफी नजदीक आ गए हों। प्रदूषण रहित आकाश जैसे ध्रती को छूने के लिए बेताब हो। डाक बंगले में ही रात के भोजन का प्रबन्ध् किया गया था। यहां का चैकीदार सहायक की भूमिका भी निभाता है। शेरसिंह नामक चैकीदार काफी दिलचस्प किस्म का आदमी था। उसकी चोटी उसकी अपनी उंफचाई से भी अध्कि लम्बी थी। उसने बताया कि उसने वर्षों पहले यह निश्चय किया था कि लम्बी चोटी रखंू। तभी से वह अपनी चोटी की देख रेख में लगा हुआ है। वह चोटी को इस कदर बांध् कर रखता था कि उसकी लम्बाई का कोई अंदाजा नहीं लगाया जा सकता।

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द्वाराहाट –
उत्तराखण्ड राज्य के अल्मोड़ा जनपद में समुद्र तल से 1540 मीटर की उंचाई पर स्थित द्वाराहाट एक रमणीय स्थल है। यह एक छोटा शहर है जो अल्मोड़ा-बद्रीनाथ मार्ग या कौसानी-रानीखेत मार्ग पर स्थित है। यहां के मंदिर आठ समूहों में विभक्त हैं। परन्तु अब सात समूहों के ही मंदिरों के अवशेष दिखाई देते हैं। कहते हैं भगवान श्रीकृष्ण मथुरा पर होने वाले आक्रमणों से जब तंग आ चुके थे तब उन्होंने सुदूर हिमालय की श्रृखंला में द्वारका बसाने की सोची, द्वाराहाट को उस समय की द्वारका कहा जाता है। द्वाराहाट में पानी की कमी के कारण भगवान श्रीकृष्ण ने द्वारका यहां न बसाकर समुद्र तट पर बसाई।


15वीं शताब्दी के आस-पास चंद्रवंशी कत्यूरी राजाओं ने द्वाराहाट को पुनः द्वारका का नाम दिया और अपनी राजधनी इसी स्थान पर निर्मित की। कहते हैं तब यहां 365 मन्दिर, 365 ही कुएं और बावडियां ;नौलेद्ध थे। मंदिरों और बावडि़यों से सुशोभित यह क्षेत्रा कभी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक गतिविध्यिों का केन्द्र रहा, परन्तु निरंतर होने वाले अतिक्रमण और उपेक्षाओं के कारण मन्दिर गिरने लगे और कुंए व बावडि़यां पूर्णतः सूख गये।


द्वाराहाट में जिन मन्दिरों के अवशेष आज भी देखे जा सकते हैं उनमें प्रमुख हैं – मृत्युजंय मन्दिर समूहः यहां का मुख्य मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। शिव संहार के देवता हैं। पूर्व दिशा की ओर मंुह किए इस मंदिर समूह के अन्य मंदिर अज्ञात देवताओं के हैं, इनमें एक मंदिर भैरव देवता का है। इन मंदिरों में गर्भगृह, मंडप और अन्तराल की स्थापना की हुई हैं। अपनी श्रेष्ठ वास्तुकला के प्रतीक इन मंदिरों का निर्माण ग्यारहवीं या बारहवीं सदी में किया गया।

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बद्रीनाथ मंदिर समूहः
इस समूह के तीन मंदिर हैं। मुख्य मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है। यहां उनकी पूजा बद्रीनाथ के रूप में की जाती है। काले पत्थर की बनी विष्णु की प्रतिमा पर सम्बत् 1105 उत्कीर्ण है। एक उंफचे चबूतरे पर बना इस मुख्य मंदिर में गर्भगृह, मंडप व अन्तराल स्थापित थे जिनमें से अब मंडप के निशान भी नहीं रहे। इस मंदिर समूह का निर्माण सन् 1048 में हुआ था। इस समूह के अन्य दो मंदिर देवी लक्ष्मी और बाणसुर को समर्पित हैं। सभी मंदिरों के द्वार पूर्व दिशा की ओर खुलते थे।


वनदेव मंदिर समूहः
खीरू गंगा के तट पर खेतों में खड़े ये मंदिर पिरामिडाकार हैं। उन्नत शिखरों वाले इन मंदिरों को आयताकार चबूतरे के उफपर बनाया गया हैं। मंदिर जीर्ण-शीर्ण अवस्था में हैं। इनके अन्दर रखी गई मूर्तियां भी यत्रा तत्रा बिखरी पड़ी हैं।


कुटुम्बरी मंदिरः
इस मंदिर के अवशेष इध्र उध्र बिखरे पडे़ हैं। कहते हैं सन् 1960 तक यह मंदिर जीर्ण-शीर्ण अवस्था में था उसके बाद प्रशासनिक लापरवाही के कारण इसके स्तम्भ और पत्थरों को गांव के लोग अपने खेतों के तट बन्ध्व घरों की दीवारों को बनाने के लिए ले गए।


रतन देव मंदिर समूहः
इस मंदिर समूह में कभी नौ मंदिर थे, इनमें से छः मंदिर अभी भी खड़े हैं। उत्तर दिशा की ओर मंुह किए त्रिदेवों; ब्रह्मा, विष्णु और महेशद्ध के मंदिर एक आयताकार मंडप के उफपर बने हैं। देवी-देवताओं के अन्य तीन मंदिरों में से एक पश्चिम मुखी और दो पूर्व मुखी हैं। 13वीं सदी में बना रतन देव मंदिर समूह एक तिकोने बाड़े के अन्दर कचहरी देवल मंदिर समूहः बारह मंदिरों के इस समूह के दस मंदिर पंाच-पंाच की दो पंक्तियों में खड़े हैं। जबकि दो मंदिर यद्यपि अन्य मंदिरों से छोटे हैं एक उंफचे स्थान पर बनाए गए हैं। ऐसा माना जाता है कि ये मंदिर रतन देव मंदिर समूह से सम्बन्ध्ति हैं। शिव और विष्णु को समर्पित ये मंदिर  स्तम्भों पर खड़े हैं। यहां शिवलिंग स्थापित है। इन मंदिरों का निर्माण 11वीं से 13वीं सदी के मध्य किया गया है।

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मणियान मंदिर समूहः
नौ मंदिरों के इस समूह के चार मंदिर एक ही परिसर में निर्मित किए गए हैं। तीन मंदिर  जैन तीर्थकंरों को समर्पित हैं। अन्य सभी मंदिरों में हिन्दू देवी-देवताओं की प्रतिमाएं हैं। उत्कृष्ठ वास्तुशिल्प के यह मंदिर 11वीं से 13वीं सदी में बनाए गए हैं।  मन्दिरों के जीर्णो(ार का काम भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण कर रहा है परन्तु विगत में इस मंदिर परिसर की घोर उपेक्षा हुई है जिसके कारण कई मंदिर अपनी मूल पहचान खो चुके हैं।


द्वाराहाट से लगभग एक हजार मीटर उफपर दूनागिरि पर्वत है। ऐसी किंवदन्ति है कि जब हनुमान जी द्रोणागिरि पर्वत को उठाकर ले जा रहे थे तभी उसका एक भाग यहां गिर गया जो दूनागिरि कहलाया। स्थानीय लोग बताते हैं कि इस पर्वत पर जड़ी-बूटियां आज भी उगती हंै। यहां बांज बुरांस के घने वृक्षों के मध्य मां दूनागिरि का मन्दिर है जिसे शक्तिपीठ और वैष्णव देवी मन्दिर के समकक्ष मान्यता प्राप्त है। यहां कई सीढि़यां चढ़कर पहंुचा जा सकता है। यहां चारों ओर बुरांस के वृक्ष नजर आते हैं। बसन्त )तु में ये वृक्ष पूफलों से लदे होते हैं। इन पूफलों से बनाया गया शरबत हृदय रोगियों के लिए लाभदायक होता है। स्थानीय लोग इन पूफलों का रस निकालकर बेचते हैं।


आश्चर्य तब हुआ जब ूफलों का रस शराब की बोतलों में भर कर बेचा जा रहा था। पूछने पर ज्ञात हुआ कि सरकार द्वारा पूफलों के रस निकालने के लिए कोई प्रव्रिफया प्रयोग में नहीं लाई जाती, यहां बाटलिंग की भी कोई व्यवस्था नहीं है अतः सैनिकों द्वारा लाई गई शराब की बोतलों के खाली होने पर उनका उपयोग बुरांस के पूफलों के रस को भरने के काम में लाया जाता है। स्थानीय शासन को इस ओर ध्यान देना चाहिए और इस उद्योग को बढावा देना चाहिए। इस उद्योग से स्थानीय लोगों की आर्थिक स्थिति में सुधर आएगा।


विभांडेश्वर महादेवः
द्वाराहाट से लगभग पांच कि.मी. नीचे विभांडेश्वर महादेव मन्दिर शीमल गांव की सीमा में है। महादेव मंदिर का निर्माण सन् 1319 में किया गया था। मंदिर में नाग दम्पति को बहुत ही सुन्दर ढंग से उत्कीर्ण किया गया है। इस धम का वर्णन स्कन्दपुराण के मानस खण्ड में मिलता है। कहा गया है कि पार्वती से विवाह करने के पश्चात् महादेव ने शयन करने की इच्छा प्रकट की तब पर्वतराज हिमालय ने उनका शयनकक्ष तैयार किया। शिव ने अपना सिर हिम शिखरों पर, कटि को नीलपर्वत पर, दांया हाथ नागार्जन पर्वत पर, बायां हाथ पवित्रा भुवनेश्वर पर्वत पर और दारुकावन में चरणों को रखा। यहां कई वर्षों तक शिव-पार्वती ने शयन किया। विभांडेश धम के दर्शनमात्रा से राजसूय यज्ञ का पफल प्राप्त होता है। जो मनुष्य सुरभि और नन्दिनी नामक नदियों के मध्य स्थित विभंाडेश का पूजन, अज्ञान या ज्ञान से विभांडेश महादेव को स्पर्श करते हैं, वे शिवलोक प्राप्त करते हैं।


यहीं दूसरी ओर रथवाहिनी गंगा है जिसे रामगंगा कहा जाता है। कहते हैं गंगा की एक धरा राजा भगीरथ के रथ के पीछे-पीछे चली इसीलिए इसे रथवाहिनी कहा जाता है। इस नदी के दोनों तटों पर गेवाड घाटी स्थित है। यहां प्राचीन मन्दिरों की भरमार है। अगनेरी धम, महाकालेश्वर मन्दिर, राम पादुका विराठेश्वर धम प्रमुख मन्दिर है। देवताओं के राजा इन्द्र द्वारा निर्मित भगवान शिव का एकमात्रा मन्दिर इन्द्रेश्वर मन्दिर भी यहीं स्थित है।


पर्यटन की दृष्टि से इस क्षेत्रा में बहुत सम्भावनायें हैं। राज्य सरकार को इस ओर ध्यान देना चाहिये और यहां पर्यटकों के लिए सुविधयें प्रदान करनी चाहिए, मन्दिरों का जीर्णों(ार हो, ठहरने की व्यवस्था हो, यहां पहुंचने का मार्ग रामनगर, रानीखेत, द्वाराहाट दो तरपफा यातायात के लिये सुदृढ़ किया जाये। इससे राज्य सरकार को राजस्व की प्राप्ति तो होगी ही, साथ ही जो लोग अन्य पर्यटन स्थलों की ओर जा रहे हैं वह निश्चय ही इस क्षेत्रा में भी आने लगेंगे।

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बिखौती –
 
इस मेले का आयोजन विभांडेश्वर महादेव के सुरम्य घाट पर किया जाता है, तीन दिनों ;13 से 15 अप्रैलद्ध तक चलने वाले इस मेले में जनपद के स्त्राी पुरूष, बाल, वृ( सभी बहुत ही उत्साह से भाग लेते हैं। किसी समय यहां सुदूर गांवों से दल बनाकर ढ़ोल-नगाड़ों, रणसिंगा, निसगें, बाजे-गाजों के साथ रात्रि समय में ही मसालों की सहायता से पहाड़ी रास्तों की संकरी पगडंडियों पर चलकर पहुंचते थे। कभी इनका संचालन विभिन्न खामों, आलों और ध्ड़ों के थोकदार करते थे, परन्तु ध्ीरे-ध्ीरे यह मेला अपनी पहचान खोने लगा और एक समय आया जब यह पूर्णतः बंद हो गया था। कुछ वर्ष पूर्व यहां के उत्साही एवं अपनी संस्कृति के प्रति जागरूक विधयक ने इसे पुनः जीवित किया।


विषुवत संक्रंाति के दिन आयोजित यह बिखैती मेला पिफर से अपनी पहचान बनाने में जुट गया हैं, वर्ष 2009 में इस मेले का आयोजन यहां के नवनिर्वाचित विधयक पुष्पेश त्रिपाठी के नेतृत्व में हुआ। चैत्रा-मास की अन्तिम रात्रि के दिन विभिन्न गांवों के लोग दल-बल सहित विभांडेश्वर घाटी में उतरे। इन्हें देखकर ऐसा लगता है कि देव व दानव विभांडेश्वर महादेव की स्तुति करने चारों दिशाओं से आ रहे हों। प्रातः कपिलाकुण्ड में स्नान कर लोग महाकाल शिव का जलाभिषेक करते हैं। यहीं पर निरंतर प्रज्ज्वलित होने वाली ध्ूनी है। कहते हैं कि यहां शिव महाकाल के रूप में शमशानवासी हैं, यहां शिवलिंग नहीं है यहां शिव के दाहिने हाथ की पूजा होती है।


नन्दिनी, सुरभी और सरस्वती नदी के संगम त्रिवेणी में स्थित इस धम की बहुत महत्ता है। इनमें से दो नदियों का स्थान अब गन्दे नालों ने ले लिया है और सरस्वती नदी तो लुप्त हो गई है। यहां शमशान घाट है कहते हैं जिनका अन्तिम संस्कार यहां होता है उन्हंे गौलोक में स्थान प्राप्त होता है। किसी समय यहां महिष तथा बकरों की बलि दी जाती थी परन्तु 1955 में स्वामी लक्ष्मी नारयण जी महाराज के प्रयासों से बलिप्रथा बन्द हो गई। स्वामी जी ने यहां के सभी मन्दिरों का जीर्णो(ार भी किया।


यहां मंदिर परिसर में भैरव, काल भैरव, हनुमान राम आदि देवताओं के मन्दिर हैं, शिव का पंाचवा मुख-ईशान भी यहा विराजमान है इसके अतिरिक्त यज्ञशाला, भोजन कक्ष, जगमोहन, गर्भ गृह, ध्र्मशाला आदि भी निर्मित हैं, यहां एक ओर बंगाल से आये डाॅक्टरेट की डिग्री धरी परन्तु सांसारिक सम्बन्धें से दूर एक बाबा वर्षों से रह रहे हैं वहीं दूसरी ओर अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. पास करने के बाद नौकरी गृहस्थ और अन्य भौतिक सुखों को त्याग लम्बी जटा-जूट धरी स्वामी ईश्वरानंद तपेश्वरी पफलाहारी महाराज वर्षों से गहन चिन्तन और मनन में लगे हैं।


स्यालदे-
स्यालदे बिखौती मेला कुमाउंनी संस्कृति का अद्भुत संगम है। बिखौती मेला प्रारम्भ होने के दूसरे दिन द्वाराहाट के मुख्य चैराहे में इस मेले का आयोजन किया जाता है, यह मेला एक प्रकार से विजय पर्व के रूप में मनाया जाता है। कहते हैं कि एक बार मल्ली आल और तल्ली आल के बीच किसी बात पर झगड़ा हो गया तथा तल्ली आल ने मल्ली आल को पराजित कर उसके सरदार का सिर काटकर द्वाराहाट के मुख्य चैराहे में गाड़ दिया। यहां अब सिर के प्रतीक के रूप में एक पत्थर है जिसे ओड़ा कहते हैं। आल, गर्क और नौजी गांवों के लोग झंडे निशानों, ढोल दमाउ, नगाड़े, रणसिंगा आदि गाजे-बाजों के साथ तलवार और ढ़ाल का नृत्य प्रदर्शित करते हुये चैराहे पर आते हैं तथा बडी तीव्र गति से ओड़ा पर लाठियों की वर्षा करते हुये शीतला माता के मन्दिर की ओर भागते हैं, मेले में महिलायें और पुरुष झूम-झूम कर गाते, नाचते अपनी सांस्कृतिक विरासत को संजोये हुए दिखाई देते हैं। झोड़ा, चांचरी, भगनौला यहां के मुख्य लोक नृत्य और गीत हैं जिनका आनन्द मेले में भरपूर लिया जाता है।


इस सम्बन्ध् में एक प्रसि( लोक गीत-नृत्य प्रचलित है, जिसके बोल हैंः ‘‘वो भीना! कसकै जाणू द्वाराहाटा।’’


मेले में दूर-दूर से व्यापारी आकर अपनी दुकानें लगाते हैं, लोग कहीं झूले का आनन्द लेते हैं तो कहीं मिष्ठानों का। आध्ुनिक साज-सज्जा का सामान, चूडि़यां, आयातित वस्तुए आदि की मेले में भरमार रहती है। मेला तीन दिन तक रात-दिन चलता रहता है। अन्तिम दिन लगभग चार बजे सांय हमने द्वाराहाट मेले से विदा ली ओर चल पड़े रामगंगा के साथ साथ चलने वाली सड़क पर। पहले हम गेवाड़ घाटी के मंदिरों के दर्शन करने लगे यहां एक समाज सेवी अध्यापक ने हमें गेवाड़ घाटी के मंदिरों के बारे में विस्तृत जानकारी दी। रात के अन्ध्ेरे को चीरते हुए हम भिकियासैण पहंुचे। ज्यों ही नेशनल कार्बेट पार्क प्ंाहुचे डर लगने लगा कि कहीं कोई वन्य जीव सामने खड़ा होकर हमारा रास्ता न रोक ले। आखिर नेशनल पार्क को पार करते हुए लगभग 12 बजे रात्राी विश्राम के लिए रामनगर पंहुच ही गए। पूरी सड़क में कहीं भी कोई बिजली का खम्भा नहीं दिखा। यों अंन्ध्ेरे रास्ते में जहां-कहीं बस्ती मिली उसके आस पास कई लड़खड़ाते हुए अवश्य मिले। तब पता चला कि लोगों का कहना सही था कि ‘सूर्य अस्त और उत्तराखंड मस्त।’ रास्ते में सांझ ढलने पहले जैसे हम गेवाड घाटी से आगे


बढ़े सामने से दो लड़के छोटी-छोटी मछलियों को पतली टहनियों में पिरोकर लाते हुए दिखाई दिए। उन्हें हमने रोका और मछलियों का मोल भाव कर उनसे इस आशय के साथ खरीद लिया कि हमारे वाहन चालक को मछलियां पकानी आती हैं जबकि बाद में पता चला कि उसे मछलियां पकानी नहीं आती थी। पकाने से पहले उसने मछलियों की सपफाई नहीं की, तली हुई मछलियों में कड़वाहट थी जिन्हें आखिर कूड़े के हवाले करना पड़ा।


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Madan Thapliyal retired as head of Public Relations Department at New Delhi Municipal Council. Mr. Thapliyal, who hails from Uttarakhand, is an avid writer who has many  books to his credit mainly on issues related to Uttarakhand.

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