एक शादी के बहाने जौनसार A rare glimpse of Jaunsari culture

एक शादी के बहाने जौनसार  A rare glimpse of Jaunsari culture


यही लोग दिन भर खेती के,घरेलू और शादी के काम भी निपटायेंगे और यही रात भर गीत-संगीत की सुरीली धारा भी बहायेंगे.ऐसा लगता है जैसे कि दुबली-पतली छरहरी काया वाले स्त्री-पुरुष ऊर्जा के पुंज हैं,जिन्हें न दिन भर का श्रम थका सकता है, न रात भर का गीत और नृत्य. बल्कि गीत और नृत्य तो इनमें उर्जा का पुनर्संचार करते प्रतीत होते हैं.



इन्द्रेश मैखुरी


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गानी शादी में अब्दुल्ला कैसे और क्यूँ दीवाना हुआ होगा,यह तो पता नहीं,लेकिन पिछले दिन एक ऐसी शादी में जाने का मौका मिला जिसमें पहुंचकर बेगानापन और दीवानापन आपस में हिल-मिल गए.


बाकी रह गया तो बस उत्सव का उल्लास. यह शादी थी जौनसार में. इस शादी में हमारे शिक्षक मित्र सुबोध मनोड़ी, हमें लगभग जबरन ही ले गए.


वहां सुबोध के अलावा हम किसी को नहीं जानते थे और कोई हमें नहीं जानता था. शादी के दिन जरुर इस क्षेत्र के सक्रीय सामाजिक कार्यकर्ता, स्वतंत्र पत्रकार और हमारे पुराने मित्र इंद्र सिंह नेगी जी से मुलाक़ात हुई.


वे भी चौंके कि हम इस शादी में कैसे पहुंचे हुए हैं. लेकिन किसी को न जानने और किसी द्वारा न पहचाने जाने के बावजूद, वहाँ रहने के दो दिनों में न हमें किसी तरह के अजनबीपन का अहसास हुआ और न मेजबानों की आत्मीयता में किसी तरह की कमी नजर आई, न हमारे अनिमंत्रित होने पर कोई शिकन.


शादी का पूरा माहौल बेहद उल्लासमय, उत्सवी और झंकृत कर देने वाला था. शादी के इस पूरे अवसर के दौरान बाकी सब चीजों के अलावा यदि किसी चीज का प्रभुत्व था तो वह था संगीत और नृत्य का. हालांकि मेंहदी वाली रात में, डी.जे. भी अर्द्धरात्रि के भी कई घंटे बीत जाने के बाद बजा.


लेकिन इस क्षेत्र के स्त्री-पुरुष, युवक-युवतियां गीत-संगीत, नृत्य के लिए किसी डी.जे. या ऑर्केस्ट्रा के मोहताज नहीं हैं. इनमें से हर कोई बेहतरीन गायक है और उतना ही बेमिसाल नर्तक भी. जौनसारी लोकगीतों की धुन पर थिरकते युवक-युवतियों के बीच नृत्य की प्रतियोगिता होती है.


ऐसी किसी प्रतियोगिता के होने के लिए ना तो किसी मुनादी की जरुरत पड़ती है और ना ही यह किसी पुरस्कार या अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए है. यह नृत्य की प्रतियोगिता तो बस इस अवसर को और आनंददायक बनाने के लिए है. इसलिए ढोल-दमाऊ बजना शुरू होते ही, सुरीले कंठों से लोकगीतों का सोता बह निकलता है और अनगिनत पांव खुद ही ताल मिलाते हुए एक दूसरे के साथ थिरकने लगते हैं.


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यह थिरकन किसी प्रशिक्षण से नहीं आई है. बल्कि पीढ़ी दर पीढ़ी थिरकते लयबद्ध पैरों की पुरानी पीढ़ी से नयी पीढ़ी तक पहुंची है. जब लोकगीतों पर एक साथ, एक ही जैसी मुद्रा में थिरकते दर्जनों लोगों को देखते हैं तो उनके हाथों की भंगिमा को देख कर लगता है कि कुछ आसान सा मामला है.


लेकिन लयबद्ध, तालबद्ध थिरकते पैरों को गौर से देखने पर मालूम पड़ता है कि नृत्य उतना सरल नहीं है, जितना दिखाई पड़ रहा है. लोकगीत गाते इतने सारे सुरीले कंठों और उनकी धुन पर थिरकते लोगों को देखना अपने आप में रोमांचित कर देने वाला अनुभव था.


ऐसा भी नहीं है कि कुछ लोग सिर्फ गीत ही गायेंगे और कुछ सिर्फ नृत्य ही करेंगे. बल्कि जो गीत गा रहा है, वह नृत्य भी कर रहा है और जो नृत्य कर रहा है, वह गीत भी गा रहा है. इसके बावजूद मजाल है कि कहीं सुर, ताल या कदम गड़बड़ा जाएँ.


दर्जनों सुरीले कंठों से गाये जाने वाले गीत मूलतः जौनसारी लोकगीत हैं. बीच-बीच में कभी-कभार कुमाउनी “बेडू पाको बारामासा”, नेपाली “तुमरो-हमरो माया, ओ कांछी लागी गयो देहरादुने मा” और हिंदी “मेरे सामने वाली खिड़की पे, एक चाँद का टुकड़ा रहता है” भी आ जाते हैं.


पर ये भी इस कदर जौनसारी लोकधुन में रंगे होते हैं कि ये भी कुछ स्थानीय लोकगीत ही मालूम होते हैं. यह नृत्य और लोकगीतों का कार्यक्रम घंटों-घंटो निर्बाद्ध रूप से चलता रहता है. लगभग रात और सुबह की सीमा पर आकर यह सम्पन्न होता है. ऐसा भी नहीं है कि शादी के मौके के या अन्य घरेलू कामों को निपटाने वाले लोग अलग होंगे और नृत्य संगीत वाले लोग अलग.


यही लोग दिन भर खेती के, घरेलू और शादी के काम भी निपटायेंगे और यही रात भर गीत-संगीत की सुरीले धारा भी बहायेंगे. ऐसा लगता है जैसे कि दुबले-पतले छरहरी काया वाले स्त्री-पुरुष ऊर्जा के पुंज हैं, जिन्हें न दिन भर का श्रम थका सकता है, न रात भर का गीत और नृत्य. बल्कि गीत और नृत्य तो इनमें उर्जा का पुनर्संचार करते प्रतीत होते हैं.


एक समुदाय होने का बोध जैसे इनमें रचा-बसा है. इनके लयबद्ध, तालबद्ध होने में वह बोध झलकता है और बाकी कामों में भी. मेंहदी वाली रात को नृत्य गीत का दौर संपन्न होने के बाद सुबह किस-किस को क्या जिम्मेदारी निबाहनी है, इसकी बाकायदा उद्घोषणा हुई.


सुबह देखा कि बिना किसी अफरा-तफरी के सब काम हो रहे हैं. सब अपनी जिम्मेदारी निबाह रहे हैं.

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यहाँ परंपरागत लकड़ी के बने हुए पुराने मकान बहुतायत में हैं. कुछ तो पचास साल से भी पुराने. इन पुराने मकानों का का नीचे का हिस्सा पत्थर का और अधिकाँश हिस्सा लकड़ी का बना हुआ है.


सुना था कि “प्रेम गली अति सांकरी”. पर इन स्नेहिल लोगों के लकड़ी के घरों के अति संकरे दरवाजे से घुसते हुए लगता है कि इससे संकरी तो वह प्रेम गली भी न होगी.

दरवाजे से घुसते हुए यह संकरापन आपके पूरे शरीर के लचीलेपन की परीक्षा लेता है. लेकिन इस संकरे दरवाजे से प्रवेश करने पर आप पाते हैं कि एक बेहद खुले-खुले व्यवस्थित, हवादार और बाहरी रौशनी के पहुँचने के पर्याप्त इंतजाम वाले व्यवस्थित रूप से बने हुए लकड़ी के ढाँचे के अंदर आप हैं.


इसमें एक हॉलनुमा बड़ा सा कमरा है तो रसोई के लिए अलग से जगह, कपडे, खाद्य सामग्री आदि जरुरत की चीजें रखने के लिए लकड़ी की दीवारों के अन्दर ही ऐसी व्यवस्था है कि सब कुछ करीने से रखा भी हुआ है और कमरे में कुछ दिख भी नहीं रहा है. भीतर ही नहाने की जगह भी है तो वहाँ पानी पहुंचाने के लिए अलग से दरवाजा भी.


इसी घर के निचले तल पर पालतू पशुओं के लिए भी जगह है. लकड़ी और पत्थर के ढलवां छत वाले ये मकान हर मौसम के अनुकूल हैं. लिंटर वाले ढाँचे भी कुछ हैं. लेकिन यहाँ लोगों ने इन्हें भी अपने परंपरागत मकानों के सहायक की तरह बनाया हुआ है.

उत्तराखंड में आपदा के बाद विश्व बैंक और ए.डी.बी. के कर्जे से सरकार 2500 मकान बना रही है. भूकंपरोधी,आपदारोधी बताये जा रहे ये मकान भी कुल मिल कर सीमेंट के ही ढाँचे हैं,जिनकी आपदा,भूकंप झेलने की कूवत संदेहास्पद है.इनमें से 2 मकान तो बनते-बनते ही धराशायी हो चुके हैं.जौनसार में लोगों के अपने पीढ़ियों के अनुभव से अर्जित ज्ञान से बनाए हुए लकड़ी और पत्थर से बने हुए मकान किसी भी आपदा के मुकाबले मजबूती से टिके रह सकते हैं.

पर सरकार इस ओर देख लेगी तो वर्ल्ड बैंक,ए.डी.बी. का पैसा ठिकाने कैसे लगेगा !


हम वधु पक्ष वाले घर में आये थे. फिर सुबोध भाई जो हमें यहाँ लेकर आये थे, उन्होंने बताया कि हम बारात के साथ लड़के वालों के यहाँ भी जायेंगे.


हम थोडा संशय में थे कि वहां का माहौल कैसा होगा. लेकिन वहां पहुंचे तो वैसा ही अपनापन, वैसी ही आत्मीयता और गीत, नृत्य का वैसा ही झुमा-थिरका देने वाला माहौल.


वैसे सुबोध भाई की इन लोगों के साथ ट्यूनिंग भी गजब की है. वे इस क्षेत्र में प्राईमरी के शिक्षक हैं. लेकिन पूरे गाँव के साथ वे एकदम घुलेमिले हैं. अपने स्कूल के छोटे-छोटे बच्चों के साथ भी.


गाँव में शादी का माहौल है. ऐसे में कौन बच्चा है, जो स्कूल जाना चाहेगा. सुबोध भाई एक-एक बच्चे से बड़े प्यार से मनुहार कर रहे हैं – चलो जरा स्कूल चलते हैं. बच्चे गुरु जी को ना तो नहीं कह पाते पर स्कूल जाने को तैयार भी नहीं हैं.


इसलिए वे शादी की धूमधाम के बीच में छूमंतर हो जा रहे हैं. पर सुबोध भी पकड़-पकड पर बच्चों को मनाने पर लगे रहते हैं. अंततः वे कुछ बच्चों को स्कूल चलने के लिए मना ही लेते हैं. जिस घर की लड़की का विवाह है, उस घर और गाँव के साथ तो वे हिले-मिले हैं ही, पर वर पक्ष के गाँव में जा कर लगा कि वे इस कदर स्थानीय लोगों से घुले-मिले हैं कि उन्हीं में से एक लगते हैं.


इस आत्मीयता में सुबोध की मिलनसारिता के साथ ही इस क्षेत्र के लोगों की स्नेहिल प्रवृत्ति की भी बड़ी भूमिका है, जो अपने यहाँ आने वाले किसी भी व्यक्ति को अजनबी नहीं रहने देते.


वर पक्ष के यहाँ पहुँच कर पता चलता है कि यहाँ मेहमानों को गाँव के सभी घरों में ले जाकर उनकी खातिरदारी की जाती है. घर बड़ा हो, छोटा हो पर लोगों की निश्छलता, स्नेहिलता खूब छलछलाती है.


घर-घर जाने के इस क्रम बातों और किस्सों का दौर चल निकलता है. लोग रस ले-ले कर बताते हैं कि कैसे उनके क्षेत्र के एक युवा ने शर्त जीतने के लिए सामान से लदा हुआ गधा कंधे पर उठा लिया था.


ऐसे ही एक और व्यक्ति का किस्सा वे सुनाते हैं कि सीमेंट के तीन कट्टे कंधे पर उठा कर वह कुछ किलोमीटर की दूरी से अपने घर ले आया. इसी बातचीत में खूब बड़ी मूछों वाले शमशेर सिंह का किस्सा भी लोग बताते हैं कि कैसे वे गुलदार से लड़ गए. उनके हाथों, पैरों पर 7-8 वर्ष पहले की उस लड़ाई के चिन्ह आज भी देखे जा सकते हैं.


जौनसार के जिन दो गांवों में हम गए उनका नाम है – रामपुर और गड़ेता. ये देहरादून जिले के कालसी ब्लॉक में हैं और देहरादून से कुछ सवा सौ किलोमीटर की दूरी पर.


लेकिन देहरादून से लगे होने के बावजूद ये किसी दुर्गम, दूरस्थ पहाड़ी क्षेत्र जैसे ही नजर आते हैं. आवागमन का साधन टैक्सी के तौर पर चलने वाली महिंद्रा यूटिलिटी हैं, जिनकी छत खुली और लोहे की जाली वाली है.


इनके निश्चित समय और सीमित संख्या में चलने के कारण ये अपनी क्षमता से कई गुना अधिक सवारियां भर कर ले जाते हैं. इन वाहनों में तिल रखने की जगह भी यदि रहे तो वहां भी एक आदमी ठूंस दिया जाता है.


गड़ेता गाँव चारों तरफ से पहाड़ों से घिरा हुआ, गहरी तलहटी में है. इस गाँव को जाने वाली सड़क को, सडक कहना भी कुछ अतिशयोक्ति ही लगता है. ग्रामीणों ने बताया कि जिस दुष्कर सडक से उनके गाँव पहुंचा जाता है, उसमें से तीन किलोमीटर सडक तो उन्होंने स्वयं खोदी है.


यह 2002 की बात है. उत्तराखंड राज्य बनने के दो वर्ष बाद की. आज राज्य बने 15 वर्ष पूरे होने को हैं और आज भी उस सडक की वैसी ही हालत है. यह हालात तब हैं जबकि उत्तराखंड सरकार में कैबिनेट मंत्री प्रीतम सिंह और उनके परिवार का दशकों से इस क्षेत्र में एकछत्र राजनीतिक वर्चस्व है.


पता नहीं नारों में इतना अधिक गूंजने वाले – विकास,तरक्की-जैसे जुमले शहरों की चौहद्दी के पार होते ही दम क्यूँ तोड़ देते हैं.


इस क्षेत्र में लोगों की आजीविका का मुख्य साधन खेती और पशुपालन है. वे नकदी फसलें जैसे आलू, अरबी, मटर, लहसुन, अदरक आदि उगाते हैं. पप्पू चौहान, जिनकी बहन की शादी में हम शामिल हुए, बताते हैं कि यदि फसल ठीक हो जाए तो एक-डेढ़ साल का गुजारा आराम से हो जाता है.

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ग्रामीणों के श्रमदान से बनी सड़क


महिलाओं को कमोबेश बराबरी का दर्जा जौनसारी समाज में है. यह कामकाज में भी नजर आता है. गीत और नृत्य में महिलायें की भागीदारी में यह बराबरी नजर आती है. यहाँ तक कि जब विवाह के सामूहिक भोज में खाना खाने की बारी आई तो वहां भी महिलायें पहले या पुरुषों के साथ-साथ बैठी.


महिलाओं को पहले या पुरुषों के साथ खाना परोसा जाना, परम्परागत पहाड़ी समाज में तो लगभग नामुमकिन है. यहाँ कि बहुत सी परम्पराएं ऐसी हैं जो महिलाओं के परिवार के मुखिया होने के दौर वाले मातृसत्तातमक समाज की अवशेष मालूम पड़ती हैं.


महिलाओं की बराबरी जैसी यह स्थिति राहुल सांकृत्यायन के उपन्यासों- “जय यौधेय” और “सिंह सेनापति” के महिला पात्रों की मुक्त-उन्मुक्त स्थितियों का बरबस स्मरण कराती है.


अपनों के बेगाने होने के इस दौर में, बेगानों का यह अपनापन, अंतर्मन को छू लेने वाला था. यह उत्सवधर्मिता, उल्लास, बेलौस अंदाज और गीत-नृत्य की धारा सबको तरंगित करती रहे, झंकृत करती रहे.


आमीन……


संपर्क- indresh.aisa@gmail.com

साभार — http://patrakarpraxis.com/

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4 Comments

  1. Megha September 10, at 07:53

    Nice read. It reminds me of cholia dance with beats of dhol and damua which used to be an essential feature in all the marriages in my village that I attended as a kid.

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  2. Uttarakhand Panorama September 10, at 18:14

    Thanks for commenting. Cholia is one music-dance form that is very close to hearts of every Uttarakhandis. Hope this art form is revived to become part of every wedding.

    Reply
  3. bharat September 24, at 02:43

    wonderful description of a jaunsari marriage. Last time I read about detailed account of stay in jaunsar area in PAHAD. It is really overwhelming to know that jaunsari people still maintaining their cultural heritage, traditions,music and dances. Kudos

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    • Uttarakhand Panorama September 24, at 04:19

      Thanks for your valuable comments. Indeed, Jaunsari people are making all efforts to keep their traditions and culture alive. Kudos to them. As Uttarakhandis are migrating from their state looking for employment opportunities, keeping our traditions and culture alive is a challenge for each one of us.

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