हयात दा को हमारा नमन Meet Uttarakhand’s very own ‘Mountain Man’

हयात दा को हमारा नमन  Meet Uttarakhand’s very own ‘Mountain Man’


♦ हयात दा हैं हर उत्तराखंड नागरिक की प्रेरणा

♦ उत्तराखंड के ‘मांझी- माउंटेन मैन’



रमेश भट्ट



हते है इंसान चाहे तो क्या नही कर सकता। प्रकृति में मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जो नित नये कार्यो से अपनी ख्याती अर्जित कर रहा है।

फर्क सिर्फ इतना है कि किसी की मेहनत को दुनिया सलाम करती है तो कोई दिन रात मेहनत करके भी कुछ नही पाता। मगर सही मायनों में जो चुपचाप अपने आप को बिना फल की चिंता किए कर्मक्षेत्र में झोंक देता है वही निष्काम कर्मयोगी है। जिसे ने धूप की चिंता होती है, न बरसात का भय। जो पहाड़ खिसकने से भी नही डरता जो हाड़ कंपा देने वाली ठंड में भी अपने कर्म पर लगे रहता है। जिसने जीवन में सिर्फ एक ही लक्ष्य रखा हो और उसी को सर्वस्व समर्पित कर दिया हो। ऐसे मनुष्य को आप क्या कहेंगे?

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अनुयायियों और प्रशंसकों के साथ हयात दा


जरा सोचिए हमारे नेतागण सड़क बनाने से पहले अपनी नाम की शिला पहले लगवा देते हैं। सड़क बनेगी या नही इसकी भी गारंटी नही मगर नेताजी का नाम उस शिला में जरूर आना चाहिए। मगर आज हम आपकी मुलाकात करवा रहें है एक ऐसे इंसान से जो सही में पहाड़ से हौंसलों वाला है। जिसकी उड़ान कभी नही थमी।

न प्रचार का शौक, न कोई आकांक्षा। बस एक ही सपना। सड़क बनाते चलो। बिना रूके, बिना थके, पूरी निष्ठा के साथ अपने कार्य को अंजाम दो।

उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले का पणकोट गांव। अल्मोड़ा से तकरीबन 15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह गांव आज दुनिया के नक्शे पर एक अहम स्थान रखता है। अगर मानदंड निष्काम कर्मयोगी का हो तो शायद यह गांव भगवान श्रीकृष्ण के इस महामंत्र का आधार बन चुका है।

इस गांव को यह अहम स्थान दिलाया है हयाल सिंह चिलवाल ने। उम्र 80 साल। काम पहाड़ काटकर सडक बनाना।  इच्छा कुछ नही। सपना कुछ नही। निष्काम कर्मयोग का इससे बड़ा उहाहरण भला कहां मिलेगा। हयात सिंह चिलवाल पीडब्लूडी में बेलदार के पद पर काम किया करते थे। उस दौरान की उनका काम सड़को की मरम्मत करना रहता था। मगर किसे पता था की इसी सड़कों को बनाने में वह अपनी जिंदगी लगा देंगे।

आज से करीब 20 साल पहले हयात दा ने पीडब्लूडी में अपनी सेवा के जरूरी सारे साल पूरे कर लिए। मगर इसके बाद भी अपने काम के प्रति लगन कम नही हुई। उस दौरान हयात दा के गांव में शमशान तक अर्थी ले जाने के लिए कोई रास्ता नही था। अर्थी दो कंधों में ले जाना नामुमकिन सा था। बस इसी बात ने हयात को परेशान कर दिया। और उन्होने प्रण कर लिया की शमशानघाट तक के रास्ते को वह अकेले दम पर बना देंगेहयात दा एक सब्बल और बिलचा लेकर सुबह निकल जाते और शाम को ही लौटते। शुरू में पहाड़ काटना मुश्किल हो रहा था। मगर जिसकीउमंग पहाड़ से भी विशाल हो भला वह असफल कैसे हो सकता था। कई महिनों की कड़ी मेहनत के बाद हयात दा ने शमशान तक जाने के लिए पहाड़ो के बीच से एक रास्ता तैयार कर दिया। मगर यह तो शुरूआत थी। हयात दा का अगला टारगेट अपने गांव को दूसरे गांव से जोड़ना था।

हयात दा इस मिशन में अकेले जुट गए। उन्होंने अपने गांव को दूसरे कई गांवों से जोड़ दिया।

मसलन :
 
पणकोट से उजगल 2 किलोमीटर ; केस्ता से पणकोंट 2 किलोमीटर ; पणकोंट से शमशान घाट 3 किलोमीटर ;  रमोड़ा से पणकोंट 3 किलोमीटर ; धोलाघट से पणकोंट 5 किलोमीटर ; गोविन्दपुर से पणकांेट 2 किलोमीटर ; पणकांेट से तारपत्थर  3 किलोमीटर  ; पणकोंट से प्राइमरी स्कूल 1 किलोमीटर  

 इसके अलावा न जाने कितने पहाड़ों को काटकर लोगों की जिन्दगी को आसान बना दिया हयाल सिंह चिलवाल ने।

जिस गांव से अर्थी नही उठ पाती, जहां बहनों की ढोलियां नही उठ पाती। एक गांव से दूसरे गांव का कोई संपर्क नही होता। बच्चे स्कूल नही जा पाते थे। महिलाओं जंगलों के पतले पतले रास्ते में घायल हो जाती यहां तक की जान चली जाती, उस गांव की तस्तीर बदल चुकी है। आज गांवों में लोग एक दूसरे के यहां जाते है।

हयात दा का हौसला आज भी वही है। वह कहते है न थकूंगा न रूकंगा। जब तक प्राण है तब तक सड़क निर्माण के कार्य में लगा रूहूंगा।

आप ही बताइये देखा है कहीं आज तक ऐसा निष्काम कर्मयोगी।

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लेखक रमेश भट्ट के साथ हयात दा


ramesh
रमेश भट्ट एक वरिष्ठ टेलीविजन पत्रकार है.  ट्विटर हैंडल — @teenubhatt

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2 Comments

  1. sunil negi September 02, at 14:07

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    • Uttarakhand Panorama September 02, at 14:41

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