आमा की याद में !!! In the memory of dear ‘Aamaa’

आमा की याद में !!! In the memory of dear ‘Aamaa’


मुझे लगता है जाते-जाते आमा एक “पोटली” थमा गई थी मुझे…. जब भी खोलता हूँ तो कोई रचना बस यों ही हाथ लग जाती है — कभी कुमाऊँनी में ‘कणिंक’ तो कभी हिन्दी में…संस्मरण ज्ञान पंत द्वारा


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झे आमा यानी दादी की बहुत याद आती है। बात सन् 1982 के शुरुआती दिनों की है जब आमा लोहे के सन्दूक में पूरा पहाड़ समेटकर वाया बरेली यहाँ आयी थी। साल-डेढ़ साल ही रही होंगी बरेली में ।  वर्ष 1970 से पूर्व दो-तीन बार गर्मी की छुट्टियों में मुझे रहने को मिला था गाँव में क्योंकि पड़ोस गाँव के रेबाधर दादा का साथ होने पर बाबू मुझे भेज देते थे । हम चार भाई-बहनों का जन्म लखनऊ में हुआ है और एक भाई गाँव में पैदा हुआ — तब में कक्षा चार पढ़ता था …. आमा के साथ के लिए एक साल बाबू ने हम सबको गाँव भेज दिया लेकिन अगले ही साल हम फिर लखनऊ आ गए थे ।

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आमा से भी कहा था लेकिन उसका सदैव एक ही उत्तर होता … जब तक हाथ पैर चल रहे हैं, यहीं ठीक है । फिर तो आना ही पड़ेगा, कहाँ जाऊँगी बेटा! ये कारोबार ….

वास्तव में अकेले रहने के बावजूद आमा ने गाय , बैल , खेती – बाड़ी … क्या नहीं जोड़ रक्खा था । अनाज भरे भकार, बारात भर बर्तन, और दूध, दही, घी, फल, फूल … भोकर् ( पूजा में बजाया जाने वाला वाद्य – तुरही सा ), दन् (कालीन ) आदि सब था … आखिर कभी तो बच्चे आयेंगे घर ! लेकिन ऐसा होता है क्या ? मैं भी कहाँ जा पाया बाद में … वर्ष 1987 में 16 वर्षों बाद गया था एक चचेरी बहिन के विवाह में ।


खुशी- खुशी नहीं , आमा जिंदगी से हारकर आयीं थी लखनऊ – वरना कौन छोड़ता है “जमीन” अपनी! नई पीढी क्या जाने जमीन छोड़ने का दर्द …. उसके पास जमीन है ही कहाँ ? फ्लैट्स में जमीन नहीं होती और वे भावनाओं कीे नींव पर खड़े भी नहीं होते। वर्ष 1988 तक हमारे ही साथ रहीं लखनऊ में… उसके बाद तो आमा ही नहीं रही फिर !


मैं कुमाऊँनी समझता था, लेकिन आमा के चक्कर में मैंने बोलना भी सीखा। घर में उसकी जन्मतिथि कोई नहीं जानता था । नौ साल में ससुराल आ गयीं थीं। पेटीकोट का नाड़ा भी पधान ताऊजी की माँ ने बाँधा था बल् । हम लोगों के लिए आमा अच्छा टाइम पास थी । उसकी पाकेट मनी पर छोटे भाई की नजर रहती। सन्दूक का सस्पेंस बना रहता — चाबी आमा गले में डाले रहती … छोटे तंग करते तो मैं बीच-बचाव करता।
मुझे याद है जब हुसैनगंज वाले घर में बिजली आयी थी तो आमा ने बल्ब देखकर पूछा था —  इसमें तेल कैसे भरते हैं तो शरारतन मैंने मीटर बाक्स और तार दिखा दिए थे। सौ रुपये के टूटे कराने पर शायद ही उसे पूरे पैसे दिए हों।


हुसैनगंज में भी जाड़ों के दिनों में साथ मिलने पर कई बार आई है आमा भट , गौहत , मड्डू , चूक , अखरोट , नारिंग , दाड़िम , अनार , मिसरी , पुलम और अलबखर की रोटियाँ जैसी (चटनी के लिए) आदि लेकर। वो सिरौले (पहाड़ी लय्या) , च्यूड़े जरुर लाती क्योंकि पिताजी को बहुत पसन्द थे लेकिन इस बार सन्दूक हल्का क्या बिलकुल खाली था । मैंने अकेले उठा कर भीतर रख दिया – शायद आमा भी “खाली” होकर ही आयी थीं मेरे मित्र नयाल जी के साथ बरेली से !


यहाँ बहुत खुश रही हो आमा – ऐसा मुझे नहीं लगता । उसके चेहरे की झुर्रियों में पूरा पहाड़ क्या… मैं जिंदगी का पहाड़ा भी पढ़ता था उन दिनों। तीन गाँवों में आमा की जमीन, हरा – भरा कारोबार … समय कैसे मजबूर कर देता है – अब मैं समझ पा रहा हूँ। बीते हुए दिन उसे बहुत याद आते। गाँव के दो एक लोग कभी बतियाने भी आ जाते … बाकी कालोनी में कौन किससे मतलब रखता है। फिर घर में भी किसके पास समय था आमा के लिए ! यादें और भी हैं लेकिन ….


मुझे लगता है जाते-जाते आमा एक “पोटली” थमा गई थी मुझे…. जब भी खोलता हूँ तो कोई रचना बस यों ही हाथ लग जाती है — कभी कुमाऊँनी में कणिंक तो कभी हिन्दी में। अब आपको भी अच्छी लगे – ये जरुरी नहीं लेकिन मेरा तो “ढाई आँखर” है ! बाद में बहुत दिनों तक आमा का सन्दूक घर में इधर-उधर , ऊपर-नीचे घूमता-फिरता जाने कब कबाड़ में गया या कोई ले गया — मुझे ठीक-ठीक याद नहीं।

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ज्ञान पंत कुमाऊँनीं और हिन्दी में कविता लिखते हैं कुमाऊँनी रचनाओं की पुस्तक “कणिंक” छप चुकी है लखनऊ में पैदा हुए, यहीं पले, पढ़े लिखे और बड़े हुए। लखनऊ विश्वविद्यालय से विज्ञान, पुस्तकालय विज्ञान में स्नातक के बाद सरकारी नौकरी। उनकी रचनायें रेडियो , दूरदर्शन व उत्तराखंड से निकलने वाली प्रमुख आंचलिक पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकीं हैं। लखनऊ हिन्दुस्तान समाचार पत्र में “मेरे शहर में” कालम में दस आलेख भी छपे हैं।

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