कहाॅं तुम चले गए A tribute to Viren Dangwal

कहाॅं तुम चले गए A tribute to Viren Dangwal


प्रसिद्ध कवि, शिक्षक और पत्रकार वीरेन डंगवाल आज हमारे बीच नही है। उन्हें उत्तराखंड पैनोरमा की तरफ से श्रद्धांजली दे रहीं हैं डॉ मन्जू पान्डे



मैं नही तसल्ली झूठ – मूठ की देता हूॅ; हर सपने के पीछे सच्चाई होती हैं

 हर दौर कभी तो खत्म हुआ करता है; हर कठिनाई कुछ राह दिखा कर जाती हैं

 आए है जब चलकर इतने लाख बरस; इसके आगे भी चलते जाएगें

 आंएगें उजलें दिन जरूर…



स कविता के रचियता वीरेन डंगवाल का जन्म ५ अगस्त १९४७ को  कीर्तिनगर, टेहरी गढ़वाल (उत्तराखंड) में हुआ। उनकी माँ एक गृहणी थीं और पिता स्वर्गीय रघुनन्दन प्रसाद डंगवाल प्रदेश सरकार में कमिश्नरी के प्रथम श्रेणी अधिकारी। उनकी रूचि कविताओं कहानियों दोनों में रही है। उन्होंने मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, कानपुर, बरेली, नैनीताल और अन्त में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने १९६८ में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम॰ए॰ और तत्पश्चात डी॰फिल की डिग्रियाँ प्राप्त की और 1971 में बरेली कालेज हिन्दी विभीग में ज्वाइंन किया, साथ में शौकिन पत्रकारिता की शुरूआत की ।


वीरेन दा के नाम से  मशहूर डाॅ वीरेन डंगवाल ने जीवन की हर भूमिका के साथ न्याय किया — फिर चाहे वह प्रोफेसर का पद हो या फिर अखबारी दुनिया हो या फिर हिन्दी कविता का क्षेत्र ।

 viren dnagwal


डाॅ वीरेन डंगवाल का पहला कविता संग्रह 43 वर्ष की उम्र में ‘इसी दुनिया में’ आया जो बहुत चर्चित रहा।  दूसरा संकलन’’दुष्चक्र में सृष्टा’ 2002 में आया। तीसरा संग्रह ‘स्याही ताल’ आया जिसमें समालोचको से लेकर आम पाठकों तक की तारीफ बटोरी। कविता रचना के अलावा वीरेन दा ने अनुवाद भी खूब किए। विश्व कविता से उन्होनें पाल्लो नेरूदा, ब्रेख्त,वास्को पोपा, मीरोस्लाव होलूब, हिकमत आदि का अपनी विशिष्ट शैली में अनुवाद किया।


डाॅ वीरेन डंगवाल को रघुवीर सहाय पुरस्कार, श्रीकांत वर्मा स्मृति पुरस्कार, शमशेर सम्मान, मशहूर कविता संकलन ‘दुष्चक्र में स्रष्टा ’ के लिए उन्हें 2004 में  ‘साहित्य अकादमी ’ पुरस्कार मिला ।


30 जून को वह बरेली कालेज से रिटायर हुए उसी दौरान उनको गले के कैंसर ने घेर लिया। वीरेन दा 28.9.2015 को तड़के इस दुनिया से विदा हो गए मगर उनकी कविताएं लम्बे दौर तक उनको हमारे बीच रखेंगी ।


डाॅ वीरेन डंगवाल अनंत में उल्लास मनाने वाले कवि नही थे न ही शाश्वत में शोक मनााने वाले, वह तो इस धरती पर गुजरते मौंसमों के गाायक थे।


तू अभी अकेला है जो बात न ये समझे; हैं लोग करोड़ों इसी देश में तुझ जैसे

धरती मिट्टी का ढेर नहीं है अबे गधे; दाना पानी देती है वह कल्याणी है
गुटरू.गूँ कबूतरों कीए नारियल का जल; पहिए की गतिए कपास के हृदय का पानी है
तू यही सोचना शुरू करे तो बात बने; पीड़ा की कठिन अर्गला को तोड़ें कैसे !


manju1

डॉ मंजू पाण्डेय, जिन्होंने अपनी पीएचडी हिंदी साहित्य में की हैं, एक जानी मानी लेखक हैं।
लेख और कवितायेँ लिखने के अलावा वो उत्तराखंड के व्यंजनों की अच्छी जानकार हैं।


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