कुमाऊंनी के उज्ज्वल भविष्य की उम्मीद A ray of hope for Kumaoni

कुमाऊंनी के उज्ज्वल भविष्य की उम्मीद   A ray of hope for Kumaoni


पहली बार कुमाऊंनी को राष्ट्रीय फलक में कुछ मान्यता मिली है। साहित्य आकदेमी ने कुमाऊंनी के दो लेखकों — श्री चारु चन्द्र पांडे और श्री मथुरादत्त मठपाल — को भाषा सम्मान देकर यह मान्यता प्रदान की है।
जब आज की पीढ़ी कुमाउॅंनी में बोलचाल से बहुत दूर हो चुकी है इन दो पूर्व शिक्षकों ने अपने सतत लेखन से कुमाउॅंनी को प्रतिष्ठा दिलाई है तो उम्मीद बंधती है।



डाॅ. कैलाश चन्द्र पपनै


हली बार कुमाऊंनी को राष्ट्रीय फलक में कुछ मान्यता मिली है। साहित्य आकदेमी ने कुमाऊंनी के दो लेखकों को भाषा सम्मान देकर यह मान्यता प्रदान की है। साहित्यकारों श्री चारु चन्द्र पांडे और श्री मथुरादत्त मठपाल को एक लाख रु. का पुरस्कार सामुहिक रूप से दिया गया है। सम्मान समारोह का आयोजन 16 अगस्त को कोयम्बटूर में किया गया था। इस समारोह में 93 वर्षीय पांडे जी शामिल नहीं हो सके थे। 75 वर्षीय मथुरादत्त मठपाल ने समारोह में न केवल हिस्सा लिया वरन् अपना धन्यवाद भाषण भी कुमाऊंनी में ही दिया।


दोनों ही साहित्यकार शिक्षक रहे हैं। अलग-अलग साक्षात्कार में दोनों ही वयोवृद्ध साहित्कारों ने कुमाऊंनी के भविष्य के बारे में आशावाद प्रदर्शित करते हुए कहा कि कुमाऊंनी साहित्य पहले ही अच्छा है। नई पीढ़ी के लेखक क्षमतावान हैं और वे इसे नई ऊंचाइयों तक ले जाने में सक्षम हैं। जरूरत है निष्ठा की और सतत प्रयासरत रहने की।


श्री मठपाल तो अपनी मातृभाषा अवार में ही लिखने वाले सोवियत गणराज्य के दागिस्तान के जाने माने कवि व लेखक रसूल हमज़ातोव का हवाला देते है। मात्र 20 लाख की आबादी वाले इस गणराज्य में 36 अलग-अलग भषाएॅं बोली जाती हैं। फिर अवार में और दूसरी भाषाओं में खूब सहित्य सृजन हुआ है। हमज़ातोव ने दुनिया भर के महत्वपूर्ण साहित्यकारों के साहित्य का अवार में अनुवाद कर अवार जनता को इससे परिचित करवाया।


दोनों कुमाऊंनी साहित्यकार मानते हैं कि कुमाऊंनी अत्यंत सशक्त भाषा है। इसके मुहावरे और ध्वन्यात्मक शब्द भंडार भाषा को अत्यंत प्रभावोत्पादक बनाते हैं। श्री चारुचन्द्र पांडे ने कुमाऊंनी के प्रख्यात कवि गुमानी की रचनाओं का अनुवाद – सेज गुमानी पुस्तक में अंग्रेजी में प्रस्तुत किया। उनकी एक और अंग्रेजी पुस्तक है- इकोज फ्राम हिल्स।

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साहित्य अकादेमी से सम्मान व पुरस्कार प्राप्त करने से पहले श्री मथुरादत्त मठपाल 1988 में उत्तर प्रदेश के हिन्दी संस्थान द्वारा सुमित्रानन्दन पुरस्कार, 2011 में उत्तराखंड भाषा संस्थान के डाॅ. गोविन्द चातक पुरस्कार, 2012 में शैलवाणी पुरस्कार से सम्मानित हो चुके थे।

इनेक अलावा भी उन्हें अनेक सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। उन्होंने 2000 से प़ित्रका ‘दुदबोली’ का सम्पादन व प्रकाशन किया। छः सालांे तक यह प़ित्रका त्रैमासिक थी और इसके 24 अंक निकले। इसके बाद इसे प्रायः 350 पृष्ठों की वार्षिकी का रूप दिया गया। मठपाल जी का मानना है कि कुमाउॅंनी के पास अकूत शब्द भंडार है, लोकोक्ति मुहावरे हैं, हजारों ध्वन्यात्मक शब्द हैं, कुमाउॅंनी शब्द हैं, कुमाउॅंनी में अन्य भाषाओं के कुमाउॅंनीकरण को सामथ्र्य है।



श्री चारु चन्द्र पाण्डे साहित्य पहले भी हिन्दी संस्थान पुरस्कार, उमेश डोभाल स्मृति पुरस्कार, पहाड़ रजत सम्मान तथा कुमाउॅनी साहित्य सेवी पुरस्कार से सम्मानित हो चुके हैं। एक प्रतिष्ठित शिक्षक के रूप में उन्हें अध्यापन हेतु 1968 में राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वह 1939 से ही लेखन कार्य में जुटे रहे।

उन्होंने कुमाउॅंनी के अलावा हिन्दी व अं्रग्रेजी में भी पुस्तकें लिखीं। उनकी छः कृतियां प्रकाशित हैं। 1982-83 तथा 1993-1996 के बीच बेंगलुरू प्रवास के दौरान उन्होंने प्रवासी उत्तराखंडियों को लोक कला, लोक गीत, कुमाउॅनी साहित्य और लोक परम्परा से जुड़े रहने व इसका प्रचार करते रहने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने न केवल होली गायन को बढ़ावा दिया वरन् नए गीतों की रचना कर उनके गायन से होली गायन को और भी आह्लादकारी बना दिया। 
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जो भी हो सुदूर दक्षिण भारत में कोयम्बटूर में 16 अगस्त को पहली बार साहित्य अकादेमी द्वारा भारतीय विद्या भवन के सभागार आयोजित एक समारोह में कुमाउॅंनी के स्वर गूंजे। मृदुभाषी मथुरादत्त मठपाल ने ‘‘द्वी आॅखर- कुमाउनीक बावत’’ शीर्षक के साथ अपने सम्बोधन में कुमाउॅंनी संस्कृति और मातृ भाषा के महत्व को सफलता के साथ रेखांकित किया। मौका था साहित्य अकादेमी द्वारा पहली बार कुमाउंॅनी को मान्यता प्रदान करते हुए भाषा सम्मान अर्पित करने का।


कुमाउॅंनी को अपनी कलम और समर्पण की भावना से प्रतिष्ठा प्रदान करने वाले मथुरादत्त मठपाल ने साहित्य अकादेमी के उपाध्यक्ष व प्रतिष्ठित तमिल कवि सिरपी बालसुब्रह्मण्यम के हाथों प्रशस्ति पत्र, प्रतीक चिन्ह तथा नकद पुरस्कार ग्रहण किया। पुरस्कार स्वीकार करते हुए कुमाउॅनी में दिये गए अपने धन्यवाद भाषण में ‘‘आयोजन में भागीदारी करनेर जागन श्रोतागण – सबन जाॅलै म्यरि पैलागी’’ कहा तो हाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।


अपने संबोधन के समापन पर श्री मठपाल ने अपनी शुभकामनाएं अर्पित करते हुए कहा-‘‘ हमर कुमाऊॅं में त्यार -बारक शुभ मौक परि जो असीक देई जैछो वकि आॅखर छन, जी रया – जागि रया (ज्यून रया,जागत रया) स्यूं कस तराण हौ – स्यावै कसि बुद्धि हौ। मरण मरण जाॅलै इजा- बबा कौनै रया। दूद चुसि र्वाट खाया जाॅठि टेकि हगण हुॅं जाया, दुब जा पनपि जाया, ब्यारा जा फई जाया, धरती बरोबरि फराङ है जाया, अगास बरोबरी अउग है जाया। तिष्टिया – पनपिया।’’


अपने संबोधन में शिक्षाविद् मठपाल ने बताया कि कुमाउॅनी-गढ़वाली में मातृभाषा के लिए ‘दुधबोली’ शब्द प्रयुक्त होता है अर्थात् वह बोली जो माॅ के दूध के साथ हमें मिलती है, जिसको हमने माॅ की गोद में खेलते हुए सीखा। उन्होंने कहा-‘‘ मेरा अपना अनुभव तो यह है कि मैंने कुमाउॅंनी का अस्सी प्रतिशत भाग अपनी मां से सीखा जो हिन्दी तक नहीं जनती थीं। कुमाउॅंनी जिसमें मैंने काफी लिखा-गुना-सम्मान पाया उसकी गुरू मेरी अनपढ़ मांॅ थीं। मैंने यह देखा-सुना है कि बहुत से कुमाउॅंनी परदेश में जा कर भी अपनी मातृभाषा को भूलते नहीं हैं। यह है हमारी दुधबोली – मातृबोली और किसी भी भाषा का समाप्त होना पूरी एक संस्कृति, एक पूरे परिवेश और एक पूरी जातीय अस्मिता का समाप्त होना है।’’


मठपाल जी का मानना है कि कुमाउॅंनी के पास अकूत शब्द भंडार है, लोकोक्ति मुहावरे हैं, हजारों ध्वन्यात्मक शब्द हैं, कुमाउॅंनी शब्द हैं, कुमाउॅंनी में अन्य भाषाओं के कुमाउॅंनीकरण को सामथ्र्य है। जैसे लम्फू (लैम्प) मौसर (मयस्सर) आदि, मनोभावों को प्रकट करने वाले शब्द हैं, यथा ‘नरै’ (किसी प्रियजन की स्मृति)।


‘‘ कुमाउॅनी का लोक साहित्य भी काफी समृद्ध रहा है, हमारे लेखकों ने लोक साहित्य से काफी कुछ टीपा है, लोक साहित्य के साथ – लोक संगीत, लोक -कला, लोक – परम्परा कुमाऊॅं में बहुत समृद्ध है। इस थाथी का एक बड़ा भाग धर्म से जुड़ा हुआ है और श्रम के साथ भी हजारों वर्षों तक हमारे पुरखे इन्हीं लोक विद्याओं से काम निकालते रहे और अपना मनो-विनोद भी करते रहे। तीज-त्यौहारों, मेले-ठेलों में या जाड़ों की रात आग के चैगिर्द बैठ कर या देव पूजन- भूत पूजन में हमारी लोक विद्यओं ने ही हमारी पीठ को सहारा दिया। गरीब-गुरबों की संजीवनी यही थी।’’


‘‘ लिखित कुमाउॅनी की परम्परा कोई दो सौ वर्ष पुरानी है। गुमानी इसके आदि कवि थे, फिर कृष्णानन्द पाण्डे – शिवदत्त सती-बाबू चन्द्र सिंह तड़ागी- गौरीदत्त पाण्डे ‘गौर्दा’ – कृपालुदत्त जोशी जैसे समर्थ कवि पैदा हुए। इधर कोई चालीस सालों से तो कुमाउॅनी में बहुत श्रेष्ठ परिनिष्ठ साहित्य की रचना हो रही है, जिससे आशा बंधती है कि बहुत शीघ्र कुमाउॅनी एक पूर्ण भाषा के रूप में स्थापित हो जाएगी।’’


साहित्य अकादेमी से सम्मान व पुरस्कार प्राप्त करने से पहले श्री मठपाल 1988 में उत्तर प्रदेश के हिन्दी संस्थान द्वारा सुमित्रानन्दन पुरस्कार,2011 में उत्तराखंड भाषा संस्थान के डाॅ. गोविन्द चातक पुरस्कार, 2012 में शैलवाणी पुरस्कार से सम्मानित हो चुके थे। इनेक अलावा भी उन्हें अनेक सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। साहित्य अकादेमी के सम्मान के बाद तथा अनेक सभा – संगठनों द्वारा उनके अभिनन्दन का सिलसिला चला है।


वास्तव में ये तमाम सम्मान एक लम्बी साधना व सेवा का नतीजा हैं। एक शिक्षक के रूप में अपना दायित्व बखूबी निभाते रहने के साथ ही उन्होंने 1950 से निरन्तर लेखन व चिन्तन पर ध्यान केन्द्रित रखा है। उनकी पहल पर 1989, 1990 और 1991 में तीन भाषाई सम्मेलनों का आयोजन अल्मोड़ा पिथौरागढ़ और नैनीताल में आयोजित किये गए।


उन्होंने 2000 से प़ित्रका ‘दुदबोली’ का सम्पादन व प्रकाशन किया। छः सालांे तक यह प़ित्रका त्रैमासिक थी और इसके 24 अंक निकले। इसके बाद इसे प्रायः 350 पृष्ठों की वार्षिकी का रूप दिया गया। इसके भी सात अंक निकल चुके हैं और आठवें की प्रतीक्षा है। अपने निजी संसाधनों से इतने सारगर्भित प्रयास के पीछे श्री मठपाल की भाषाई चेतना, सांस्कृतिक जागरूकता और अस्मिता को बनाये रखने की गहरी ललक है। उनका मानना है कि 50-50 लाख की जनसंख्या वाली कुमाउॅंनी और गढ़वाली को मान्यता मिलना कोई कठिन कार्य नहीं है।


भिकियासैंण के गांव नौला में 29 जून 1941 को स्व. कांतिदेवी मठपाल व स्वतंत्रता सेनानी पं हरिदत्त मठपाल के पुत्र के रूप में जन्मे मथुरादत्त मठपाल ने गांव में ही प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद मानिला व रानीखेत में आगे की शिक्षा ग्रहण की। आगरा विश्वविद्यालय से बी. ए.  व बी.टी. करने के बाद उन्होंने तीन विषयों में एम.ए. की डिग्री भी हासिल की। लगभग 33 वर्षाें तक उन्होंने विनायक इन्टर कालेज में शिक्षण का दायित्व निभाया। हिन्दी व कुमाउॅंनी में कविताएं व लेख लिखने व अनुवाद कार्य करने के साथ ही उनके पांच काव्य संकलन भी निकले।


श्री चारु चन्द्र पाण्डे साहित्य अकादेमी द्वारा 2014 के भाषा सम्मान को प्राप्त करने वाले दूसरे कुमाउॅनी लेखक हैं। श्री  पाण्डे शिक्षक व प्रधानाचार्य होने के अलावा लगभग 50 सालों से आकाशवाणी से जुड़े रहे हैं। 28 दिसम्बर 1923 को अल्मोड़ा के कसून ग्राम में जन्मे चारु चंद्र पांडे ने आगरा विश्वविद्यालय से हिन्दी साहित्य की स्नातकोत्तर उपाधि लेने के बाद बनारस हिंदी विश्वविद्यालय से बी.टी. की डिग्री ली और टीकमगढ़ में अध्यापन आरम्भ किया। 1981 में वे जी.आई.सी. भीमताल में प्रधानाचार्य के पद से सेवानिवृत्त हुए। वह 1939 से ही लेखन कार्य में जुटे रहे। उन्होंने कुमाउॅंनी के अलावा हिन्दी व अं्रग्रेजी में भी पुस्तकें लिखीं। उनकी छः कृतियां प्रकाशित हैं।


वे पहले भी हिन्दी संस्थान पुरस्कार, उमेश डोभाल स्मृति पुरस्कार, पहाड़ रजत सम्मान तथा कुमाउॅनी साहित्य सेवी पुरस्कार से सम्मानित हो चुके हैं। एक प्रतिष्ठित शिक्षक के रूप में उन्हें अध्यापन हेतु 1968 में राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया गया।


एक साक्षात्कार के दौरान उन्होंने बताया कि साठ के दशक में स्व. इलाचन्द्र  जोशी के सम्पर्क में आने पर उन्हें पूरा ध्यान कुमाउॅनी लोक संस्कृति पर केन्द्रित करने की प्रेरणा मिली। आकाशवाणी से उत्तरायण कार्यक्रम आरम्भ होने पर उन्होंने कुमाउॅनी कविताओं, निबंध, गीत कहानियों और नाटक रचे और प्रसारित किये। डनहोंने दुदबोली, पहरू, पुरवासी और अन्य पत्र पत्रिकाओं के लिए निरन्तर लेखन का काम किया  जो 93 वर्ष की आयु में भी जारी है।


1982-83 तथा 1993-1996 के बीच बेंगलुरू प्रवास के दौरान उन्होंने प्रवासी उत्तराखंडियों को लोक कला, लोक गीत, कुमाउॅनी साहित्य और लोक परम्परा से जुड़े रहने व इसका प्रचार करते रहने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने न केवल होली गायन को बढ़ावा दिया वरन् नए गीतों की रचना कर उनके गायन से होली गायन को और भी आह्लादकारी बना दिया।


श्री पाण्डे का मानना है कि कुमाउॅनी हिन्दी से भी अधिक सशक्त भाषा है। उन्होंने कहा कि इसका विपुल शब्द भंडार भावनाओं और विचारों की प्रभावी और सटीक अभिव्यक्ति में सहायक है। इसके मुहावरे और ऊलोकोक्तियां भाषा की क्षमता को और भी बढ़ाती हैं। कुमाउॅनी के भविष्य के बारे में पूछे जाने पर वे कहते हैं कि इसका भविष्य उज्ज्वल है। नई पीढ़ी के रचनाकार सक्षम हैं वे कुमाउॅनी साहित्य को नई ऊंचाईयों पर ले जा सकते हैं बशर्ते वे पूरी निष्ठा व समर्पण की भावना से लगे रहें।


जब आज की पीढ़ी कुमाउॅंनी में बोलचाल से बहुत दूर हो चुकी है इन दो पूर्व शिक्षकों ने अपने सतत लेखन से कुमाउॅंनी को प्रतिष्ठा दिलाई है तो उम्मीद बंधती है। अपनी मातृ भाषा से मुख मोड़ चुके लोगों में भी शायद कुछ आत्म गौरव की भावना जाग्रत होगी और वे इसे आपने सामान्य बोलचाल की भाषा के रूप में अपनाने को तैयार होंगे। मठपाल और पाण्डे जैसे जाने माने कवियों तथा अन्य रचनाकारों के काव्य के आडियो व विडियो रूपान्तरण इस प्रक्रिया को तेज करने में सहायक हो सकते हैं।


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श्री कैलाश चन्द्र पपनै — बयालीस वर्षाें से पत्रकारिता में सक्रिय श्री पपनै ने पत्रकारिता का सफर 1972 में नैनीताल में दैनिक पर्वतीय के प्रकाशन के साथ आरम्भ किया। उन्होंने संवाद एजेंसी समाचार / पी.टी.आई. के लिए भी काम किया तथा 1976 से 2008 तक दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिन्दुस्तान को अपनी सेवाएं देते हुए विभिन्न पदों पर काम किया तथा ब्यूरो प्रमुख के पद सें सेवानिवृत्त हुए। उन्होंने अनेक पत्र -पत्रिकाओं में लेखन के अलावा आकाशवाणी और दूरदर्शन के कार्यक्रमों में भी योगदान किया। अर्थशास्त्र में पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त करने वाले डाॅ पपनै विकासपरक पत्रकारिता और उत्तराखंड के विकास से जुड़े लेखन के प्रति प्रतिबद्ध रहे हैं।


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4 Comments

  1. Megha September 17, at 06:06

    Thanks for this article. Learning something new about the state everyday!!!!

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    • Uttarakhand Panorama September 17, at 17:06

      Thanks....Uttarakhand Panorama is committed to bring latest news and views for its readers.

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  2. Gaurav Pawar September 18, at 09:49

    I know Mr. Mathura Dutt Mathpal personally. He used to be our house owner in Ramanagar. A much-deserved recognition for a really sweet and talented person like him. I wish him all the success in the years to come, and may he take 'Kumaoni' to greater heights. Thank you for the article!

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    • Uttarakhand Panorama September 18, at 19:44

      We all are with great personalities like Mr. Mathapal who have been promoting Kumaoni. Let us all join hands in wishing Mr. Mathpal best wishes and long-long life.

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