गिर्दा की पत्नी ने कुमाऊं लिटफेस्ट लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड लेने के किया मना Controversy dogs maiden Kumaon LitFest

गिर्दा की पत्नी ने कुमाऊं लिटफेस्ट लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड लेने के किया मना Controversy dogs maiden Kumaon LitFest


पिछले कुछ हफ़्तों से “कुमाऊं लिटरेरी फेस्टिवल” यानि लिटफेस्ट की चर्चा थी। यह लिटफेस्ट का पहला अंक था जो शायद आ कर निकल भी जाता और किसी को पता भी नहीं चलता। पर लिटफेस्ट के आयोजकों का निर्णय कि उत्तराखंड के प्रसिद्ध जनकवि गिरीश तिवारी, जिन्हें लोग प्यार से गिर्दा कहते हैं, को पहले अंक का लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड दिया जाये उन्हें नेगेटिव पब्लिसिटी दिला गया और साथ में छोड़ गया प्रदेश कि कांग्रेस सरकार के लिए कुछ कठिन प्रश्न…


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च दिवस का ये लिटफेस्ट अक्टूबर २३ से खूबसूरत धनाचूली में शुरू हो कर नैनीताल में समाप्त हुआ। इसका उद्घाटन मुक्यमंत्री हरीश रावत ने किया वहीं समापन राज्यपाल के के पॉल ने किया। आयोजक इसे विश्व प्रसिद्ध जयपुर लिटफेस्ट कि तरह लोकप्रिय बनाना चाहते थे पर कुमाऊं लिटफेस्ट के पहले अंक में बहुत ज्यादा लेखक या चिंतक नहीं जमा हो सके एक-आध को छोड़ कर । उत्तराखंड के लेखकों और बुद्धजीवियों कि गैरमौजूदगी भी लोगों को अखरी ।


पर कुमाऊं लिटफेस्ट उस समय विवादों में आ गया जब स्वर्गीय गिर्दा को लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड देने की खबर आई । ये कहा गया कि गिर्दा कि पत्नी ने यह सम्मान लिया, जिसे गिर्दा के परिवारवालों ने नकार दिया । फिर ये भ्रम फैलाया गया कि उनके परिवार के किसी सदस्य ने ये सम्मान लिया । सोशल मीडिया — खासकर फेसबुक — में तो लोगों ने इस झूठी और भ्रामक खबर की निंदा की।

girda poet

गिर्दा और उनकी पत्नी की एक फोटो


एक हिंदी दैनिक में छपी खबर के मुताबिक में गिर्दा की पत्नी हीरा देवी कुमाऊं लिटफेस्ट के आयोजकों के “जनसरोकारों से न जुड़े होने के चलते” उन्होंने यह सम्मान लेने से इनकार कर दिया। गिर्दा स्मृति मंच के संयोजक महेश जोशी का कहना है कि जनकवि और रंगकर्मी गिर्दा की पत्नी को पुरस्कार के लिए नैनीताल आमंत्रित किया गया था। वह हल्द्वानी से नैनीताल तो आईं लेकिन कार्यक्रम स्थल पर नहीं गईं और न ही उन्होंने राज्यपाल द्वारा गिर्दा को दिया गया मरणोपरांत कुमाऊं लिटरेरी फेस्टिवल लाइफ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार ग्रहण किया।


श्री जोशी ने बताया कि गिर्दा की पत्नी ने पुरस्कार लेने से पूर्व जनसंस्कृति और गिर्दा से जुड़े रहे लोगों ने विचार विमर्श किया कि क्या उन्हें यह पुरस्कार लेना चाहिए या नहीं। इस पर गिर्दा से और जन संस्कृति से जुड़े लोगों ने एकमत होकर गिर्दा की पत्नी को यह पुरस्कार नहीं लेने का अनुरोध किया। इस पर स्व. गिर्दा की पत्नी ने पुरस्कार लेने से मना कर दिया। जब उनसे पूछा गया कि गिर्दा के नाम का पुरस्कार किसी ने मंच में ग्रहण कर लिया है तो उन्होंने कहा कि जिसने पुरस्कार ग्रहण किया है वह इसे अपने घर ले जाए, मेरे पास यह पुरस्कार किसी भी हाल में नहीं आना चाहिए, क्योंकि मैंने पुरस्कार लेने से मना कर दिया है।

kumaon litfest


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शल मीडिया के अलावा लेखकों, रंगकर्मियों एवं बुद्धजीवियों ने हाल में प्रदेश सरकार द्वारा लिए गए कुछ क़दमों को गलत बताया और इसे गिर्दा को दिए जाने वाले लाइफटाइम अचेिवमेंट अवार्ड से भी जोड़ा. पत्रकार प्रैक्सिस वेबसाइट के अनुसार  —  दिनांक 22.10.2015 को अल्मोड़ा के डीडा नैनीसार में ज़िन्दल गु्रप ने सरकार क साथ मिली भगत करके गाँव की 353 नाली यानि कि सात हजार एक हैक्टेयर भूमि का अधिग्रहण कर लिया.


ग्रामीणों के तीखे विरोध के बीच उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी के कार्यक्रताओं समेत छः ग्रामीणों को पुलिस ने हिरासत में लिया. प्रतिरोध कर रहे ग्रामीणों के साथ दमनकारी रवैया अपनाया गया. मुख्यमत्री स्वयं कार्यक्रम में रहे और उद्घाटन किया गया. यह सब इतने गुप चुप ढ़ग से हुआ कि खुद ग्रामीणों तक को बात पता न थी दूसरे दिन अखबारों में खबर थी कि ज़िन्दल ग्रुप विश्व स्तरीय विश्वविद्यालय खोलेगा.


समाचार पत्र भरे पड़े थे. पर ग्रामीणों के प्रतिरोध की खबर कहीं न थी न ही उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी के विरोध की खबरें बावजूद इसके नैनीताल समाचार के सह संपादक महेश जोशी, संपादक राजीव लोचन शाह और स्वयं मैंने जितना अपडेट सोशल साइट्स और संचार से हो सकता था किया, दूसरे दिन इस घटना कि निन्दा अन्य जगहों से भी आयी.


दिनांक 23.10.2015 टी-आरोहा नामक आयोजन समीति द्वारा आयोजित और इज़राइल ऐम्बेसी और यशबैंक (अभी तक ज्ञात केवल दो प्रयोजक संभव है और भी हों) प्रायोजित कुमाउँनी लिट्ट्रेचर फेस्टविल धानाचुली का मुख्यमंत्री ने उद्घाटन किया और इस अवसर पद्म श्री इतिहासकार शेखर पाठक और पद्म विभूषण भूवैज्ञानिक वल्दिया भी मौजूद रहे.


इस आयोजन का आरंम्भ जनकवि गिर्दा की कविता पढ़कर किया गया. धानाचूली के इस फाइव स्टार होटल में आयोजकों ने जनकवि गिर्दा को लाईफ टाईम अचीव मेन्ट अवाॅर्ड देने की घोषणा की, ध्यान रहे कि गिर्दा इस क़िस्म के चोचलों के सख़्त ख़िलाफ थे.


मुख्यमंत्री ने इसी आयोजन में यह घोषणा भी कर डाली कि अगली बार से राज्य सरकार इस फेस्टविल में एक पाटर्नर के रूप में काम करेगी!


इस पूरे घटनाक्रम को लगातार फेसबुक और दूरसंचार के माध्यम से सभी लोगों ने— जिसमें पुराने आन्दोलनकारी गिर्दा के सहयोगी रहे लोगों के साथ ही उत्तराखण्ड के जनपक्षीय रचनाकार रंगकर्मी शामिल थे— साझा किया. इसने एक ओर पुराने जनपक्षीय माने जाने वाले लोगों पर दबाव बनाया तो दूसरी तरफ आयोजन को भी लगातार सवालों के घेरे में खड़ा किया. सभी लोंगों ने इसे जन कवि गिर्दा के सरोकारों की डकैती और धानाचूली शहरफाटक इलाके में कुमाँऊ फेस्टविल नाम से अभिजात किस्म के साहित्य फेस्टविल स्थापित कर उत्तराखण्ड के जन साहित्य और जन लिख्वाड़ों को हाशिये में धकेलने की साजिस का हिस्सा माना.


रामगढ़ से लेकर शहरफाटक तक प्राकृतिक रुप से सम्पन्न इलाका है. इस इलाके में सेव के बग़ीचे व स्थानीय फलों का भरपूर उत्पादन के साथ ही हिमालय का विहंगम अवलोकन होता है. यह क्षेत्र पूर्व से ही भूमाफियाओं और शहरी पूंजीपतियों के गिद्ध दृ​ष्टि में रहा है. कई बाहरी लोगों ने आम सरल पहाड़ी लोगों की जमीनें ओने-पोने दामों में खरीद के पहाड़ी लोंगों को ही अपने बंग्लों में नौकर भी रख रखा है. धानाचूली में कार्यक्रम रखने के पीछे एक सचेत कारण मुझे व्यक्तिगत रूप से यह भी दिखाई देता है.


अभी हाल में इज़राइल द्वारा हिमाँचल के किसी गाँव को गोद लिये जाने की खबरें प्रकाश में आयी हैं, सुनने में आ रहा की कुछ अजनबी लोगों ने धानाचूली के निकट के गाँव क्वेदल और जाड़ापानी का भ्रमण किया है. बहुत हद तक संम्भव है कि जल्द ही कोई ब़डी सच्चाई समाने आये.


वैसे इस इलाके में बाहरी लोगों द्वारा ज़मीन हथियाने और स्त्रीयों के साथ निमर्म व्यवहार की खबरें आम है. ग्रामीण कई बार इन आन्दोलित भी हुए है पर रसूखदार लोगों द्वारा कई बार उन्हें आपस में तोड़कर—लड़ाकर और कई बार ओहदों का ख़ौफ दिखा कर चुप करा दिया गया है.


भांग की खेती के लिए संपन्न इलाक़ा माने जाने वाला यह क्षेत्र इसलिये भी महत्वपूर्ण है कि विदेशियों — जिनमें बहुसंख्य इजरायली लोग भी हैं— के लिये यह पूर्व से ही प्रिय रहा है. यह भी चैकाने वाली बात है कि मुख्यमंत्री द्वारा पहले दिन भाँग की खेती को बढ़ावा देने वाला बयान, दूसरे दिन पहाड़ों पर प्राइवेट स्कूल खोलने के लिये बाहरी संस्थाओं को न्योता देना, तीसरे दिन डीडा नैनीसार मे जिन्दल ग्रुप द्वारा कथित रूप से हड़प ली गई ज़मीन का उद्घाटन करने आना, चौथे दिन कथित कुमाऊँनी साहित्य उत्सव में शामिल होना, यह सब किसी पूर्व नियोजित धारावाहिक के भाग से प्रतीत होते हैं. जो भी इन सबके विरूद्ध थे वो इन घटनाओं में साम्यदेख पा रहे थे .


यही कारण था कि विरोध और प्रबल होता गया इस मुहिम मे राजीव लोचन शाह, शमशेर बिष्ट, बटरोही, पंकज बिष्ट, देवन मेवाड़ी, नवीन जोशी, महेश पुनेठा, शिरीष कुमार मौर्य, दिनेश कर्नाटक, त्रेपन सिंह चैहान, कंचन पंत, गोविन्द कफलिया,विक्रम नेगी, पृथ्वीराज सिंह और अशोक शाह समेत कई लोग शामिल थे.


इस प्रबल विरोध को देखते हुए गिर्दा स्मृति मंच के महेश जोशी ने पूरी बात गिर्दा की पत्नी के समक्ष रखी तो पता चला कि उन्हे सम्मान देने संबन्धी कोई निमंत्रण पत्र तो प्राप्त नहीं हुआ हैं.


लेकिन किसी अनजान व्यक्ति ने फोन पर उन्हें यह सूचना दी है. पूरी बात उन्हें भी मालूम न थी. गिर्दा स्मृति मंच के साथियों द्वारा गिर्दा के परिवार को जब यह संदर्भ बताया गया तो उन्होंने उसी क्षण पुरस्कार लेने से मना कर दिया.


मंगलवार को एक भव्य कार्यक्रम में गिर्दा को यह सम्मान सूबे के राज्यपाल के हाथों दिया जाना था .


इस आयोजन को लेकर जो आपत्तीयाँ थी वो इस प्रकार थी.

  1. उत्तराखण्ड में कोई भी आकर साहित्य फेस्टविल मानयें इससे कोई आपत्ति नहीं. पर उसे कुमाऊँ नाम देना उन तमाम पुरखे कवियां, कहानीकारों, ज्ञात-अज्ञात गायकों, विराट मौखिक पंरपराओं की गायक महिलाओं के साथ ही अन्याय हैं, जो जीवन भर सामंतों और पूजीपजियों के ख़िलाफ तंगहाती में भी लड़ते रहे.

  2. राज्य सरकार ने कभी भी इतनी फुर्ती से अपने लिख्वाड़ों, गायकों के प्रति, अपनी भाषा के प्रति रूझान नहीं दिखाया, आंखिर इन लोगों में राज्य सरकार की क्या रुचि थी कि स्वयं मुख्यमंत्री आकर इनको उत्तराखण्ड के जन साहित्य की ठेकेदारी करने का प्रमाण पत्र दे गये.

  3. एक दिन पहले द्वारसों नैनीसार में ग्रामीणों को ठेंगा दिखाकर ज़िन्दल के साथ साँठ-गाँठ कर रहे प्रदेश के मुखिया के साथ बिना विरोध दर्ज किए हमारे अग्रजों ने क्यों मंच साझा किया? क्या उन्हें ग्रामीणों के आंदोलन के दमन की खबर नही थी?

  4. गिर्दा जैसे वैचारिक और जनपक्ष कवि को जिसने आजीवन पूंजीपतियों का विरोध किया भूमाफियाओं के ख़िलाफ़ लिखा. ऐसे जनपरस्त कवि को जनविरोधी सरकारों और अभिजात्य धनाढ्यों के हाथों लाइफ टाईम अचीवमेन्ट अवाॅर्ड सम्मान दिलवाना हमारे प्रतिरोध के कवि और उसकी परंपरा को नुकसान पहुँचाने की साजिश है.

  5. इतने बड़े मुद्दे पर हमारे बुद्धिजीवी (एक दो को छोड़कर) क्यों चुप रहे.

  6. जिन लोगों एवं आयोजकों ने संस्थाओं ने इस आयोजन को किया क्या वो वाकई हमारे सामाजिक सरोकारों से परिचित थे?

  7. इस आयोजन में जिसे कुमाउं लिट्ट्रेरी फेस्ट का नाम दिया गया, उसमें कुमाँऊ के सरोकारों पर लिखने बोलने वाले कितने कवि, कहानीकार और संस्कृतिकर्मी मौजूद थे? यदि कोई नहीं तो फिर यह नाटक किस वर्गीय स्वार्थ के तहत रचा गया यह स्पष्ट होना चाहिए.

                                 साभार:  http://patrakarpraxis.com/?p=2990 / http://patrakarpraxis.com/?p=2969


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