रिसाल गाँव के लोग पूछें विकास किस चिड़िया का नाम है Villagers still living a primitive life

रिसाल गाँव के लोग पूछें विकास किस चिड़िया का नाम है Villagers still living a primitive life


आज भले ही भारत मंगल ग्रह पर पहुँच गया है, पर उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के रिसाल गाँव के लोग आज भी छिलकों की रौशनी में जी रहे है। गाँव में बिजली पहुंची नहीं और बाज़ार से घर तक लोग माचिस व मिटटी का तेल ले जा नहीं सकते, दरअसल गाँव का रास्ता संरक्षित क्षेत्र से होकर गुजरता है और वन्य जीव अधिनियम 1972 के अनुसार संरक्षित क्षेत्र में किसी भी ज्वलनशील वस्तु को ले जाना गैर जमानती जुर्म है।


यह गाँव सड़क, रास्ता, शिक्षा व स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित है। गेंहू, चावल, नमक जैसी दैनिक उपभोग सामग्री के लिए ग्रामीणों को 4 किमी दूर सुनोली जाना पड़ता है। आंगनबाड़ी केंद्र और उपस्वास्थ्य केंद्र भी सुनोली में ही है जिसका रास्ता घने जंगल से होकर गुजरता है। इसी कारण इस गाँव का एक भी बच्चा आगनबाडी नहीं गया।

 

migration village


आज़ादी के 68 वर्षों के बाद से इस गाँव में मात्र एक संस्थागत प्रसव हुआ है।प्राकृतिक संसाधनों से संपन्न इस गाँव की मिटटी काफी उपजाऊ है, पर्याप्त पानी की उपलब्धता से शत प्रतिशत कृषि भूमि सिंचित है। लेकिन जंगली जानवरों के नुक्सान के चलते लोगों ने खेती करना छोड़ दिया है। आज वहां की 95% कृषि भूमि बंजर पद चुकी है। 90% आबादी पलायन कर चुकी है।


ये हालत तब हैं जब सुनोली गाँव सांसद द्वारा गोद लिया गया है, और पूर्व पर्वतीय विकास मंत्री सोबन सिंह जीना का पैतृक गाँव है,


साभार – ईश्वर जोशी द्वारा फेसबुक 


 

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