शराब बनी पहाड़ के लिए एक अभिशाप Can Uttarakhand follow Bihar by banning sale of liquor?

शराब बनी पहाड़ के लिए एक अभिशाप Can Uttarakhand follow Bihar by banning sale of liquor?


शराब उत्तराखंड के लिए एक अभिशाप है। इसने न जाने कितने घर उजड़े और ना जाने कितने नोजवान बर्बाद हुए। शराबबंदी के खिलाफ उत्तराखंड ने काफी आंदोलन देखे हैं, पर इसकी मांग काम होने के बजाय बढ़ती ही जा रही है। इसी लिए उत्तराखंड को शर्मसार करती एक कहावत भी है — “सूर्य अस्त, पहाड़ मस्त”। क्या उत्तराखंड सरकार बिहार की तरह प्रदेश में शराब पर बैन नहीं लगा सकती?, पूछ रहे हैं रमेश भट्ट


त्तराखंड के लिए शराब किसी अभिशाप से कम नही है। हर बार जब इस पर पाबंदी लगाने की बात आती है तो सरकार राजस्व का रोना रोती है। 2014-15 में सरकार ने इस मद में 1300 करोड़ की कमाई की थी। जबकि 2015-16 में शराब से कमाई का लक्ष्य 1800 करोड़ का लक्ष्य रखा गया है। सरकार पाबंदी के खिलाफ इसी कमाई को अपना आधार बनाती है।

सोचिए इससे ज्यादा राजस्व शराब से बिहार को मिलता था। बिहार में 4000 करोड़ के राजस्व की परवाह ना करते हुए नीतीश कुमार ने शराब पर पूरे राज्य पर पाबंदी लगा दी।

मगर हमारे यहां शराब नेताओं की अवैध कमाई का जरिया बन गया है। शराब माफिया फल फूल रहे हैं। जनमानस में यह बात आम है कि प्रति पेटी कमीशन फिक्स है। इतना ही नही कीमत से ज्यादा रेटों पर शराब बेची जा रही है। सरकार पर बैठे लोग अपनी जेब गरम कर रहें है। राज्य के कई परिवार शराब सेवन के चलते या तो बबार्द हो गएहैं या बर्बादी की कगार पर हैं। न जाने सरकार को यह दिखता क्यों नही?


आज जरूरत है इसके खिलाफ उठ खड़े होने की। अगर महिलाऐं और युवा इस बीमारी के खिलाफ एकजुट हो जाऐं तो हम सरकार को घुटने के बल झुका सकते हैं। आज जरुरत है आर पार की लड़ाई की।


आईये देवभूमि को मदिरा से मुक्ति दिलाने का संकल्प लें। इस भाव का ज्यादा से ज्यादा प्रसार करें।

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इस तरह के शराब के फड़ जगह-जगह खोल कर सरकार ने शराब की उपलब्धता को बढ़ाया ही है


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रमेश भट्ट एक वरिष्ठ टेलीविजन पत्रकार है.  ट्विटर हैंडल — @teenubhatt

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