अमेरीका के ग्रेंस कथीडरल चर्च में योग की गूंज Yoga making waves globally!!!

अमेरीका के ग्रेंस कथीडरल चर्च में योग की गूंज Yoga making waves globally!!!

योग अब भारत से निकल कर विदेश में भी काफी लोकप्रिय हो गया है। परमार्थ निकेतन-ऋषिकेश एक ऐसी आध्यामिक और सामाजिक संस्था है जो योग शिक्षा का प्रचार-प्रसार देश और विदेश में कर रही है। ऐसा ही एक कार्यक्रम अमेरिका में आयोजित किया गया जो की काफी सफल रहा…


रमार्थ निकेतन-ऋषिकेश के परमाध्यक्ष एवं गंगा एक्शन परिवार के प्रणेता पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज के पावन सानिध्य में कैलिफोर्निया (अमेरिका ) के ग्रेंस कथीडरल चर्च में योग सम्पन्न कराया गया। योग प्रेमियों से खचाखच भरे भव्य हाल में पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी जैसे ही एकता, समरसता एवं शान्ति का सन्देश देने वाले वैदिक मंत्रों का मधुर स्वर में उच्चारण आरम्भ किया तो कैलिफोर्निया, सैनफ्रैंसिस्को अमेरिका के सर्वप्रसिद्ध विशाल ग्रेस कथीडरल चर्च का भव्य हाल मंत्रों की प्रतिध्वनित से गूंज उठा और एक अद्भुत शाश्वत शान्ति का वातावरण व्याप्त हो गया।


अमेरिका के विश्व प्रसिद्ध इस चर्च को सारी दुनिया से लोग देखने आते हैं। आज इस चर्च में योग, ध्यान के बाद हुये प्रवचन में सैनफ्रांसिस्को के भारतीय दूतावास के डिप्टी कांउलिस जनरल श्री आर वेंकटरमन एवं अनेक गणमान्य विभूतियों ने भाग लिया। अमेरिका के प्रसिद्ध वैज्ञानिक बू्रसलिप्टन एवं प्रसिद्ध चर्च के डीन व योगाचार्य डारेन ने भी भाग लिया। कार्यक्रम में योग के प्रति इतना अधिक उत्साह देखते हुये पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने सबको उत्तराखंड-ऋषिकेश आने का निमंत्रण दिया। उत्तराखंड आकर योग, ध्यान एवं पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में कार्य करने की प्रेरणा देते हुये उन्होने पतंजलि के अष्टांग योग के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होने कहा कि यम व संयम सात्विक जीवन के लिये अपरिहार्य है। संयम का पालन जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में जरूरी है। केवल स्वयं के जीवन में नहीं बल्कि हमारे द्वारा प्रत्येक प्राणी व ईश्वर की प्रत्येक रचना के साथ हमारे व्यवहार में संयम का होना जरूरी है।

साध्वी भगवती सरस्वती ने योग जिज्ञासुओं से भरे हाल में चर्चा के उपरांत ध्यान सम्पन्न कराया जिसमें लोग आनन्दमग्न हो उठे। उन्होने योग के महत्व को बताते हुये कहा कि हर मनुष्य के भीतर एक शान्त मनुष्य रहता है जिसे हम अन्तर्रात्मा कहते हैं जो हमेशा शाश्वत और यर्थाथ होती है, इसलिये माना जाता है कि हम ईश्वर का अंश है और हमारी अन्तर्रात्मा की आवाज ईश्वर की आवाज है। उसको स्पष्ट रूप से सुनने व समझने की विधा ही ध्यान है। इस कार्यक्रम में योगाचार्य, योगजिज्ञासु एवं अनेक गणमान्य लोग उपस्थित थे। उनमे से कुछ योग जिज्ञासुओं नेे ऋषिकेश आकर ध्यान एवं योग सीखने की इच्छा व्यक्त की।


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