Uttarakhand to become bridge between India and Baltic nations देव संस्कृति विश्वविद्यालय-हरिद्वार में खुला ‘सेंटर आॅफ बाल्टिक स्टडीज’

Uttarakhand to become bridge between India and Baltic nations देव संस्कृति विश्वविद्यालय-हरिद्वार में खुला ‘सेंटर आॅफ बाल्टिक स्टडीज’

Uttarakhand has got India’s first Research Centre on Baltic nations in Dev Sanskriti Vishwavidyalaya in Haridwar that will help strengthen ties between India and the Baltic nations — Latvia, Lithuania and Estonia — by promoting literary, cultural and social exchanges… 


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naugurating the ‘Centre of Baltic Studies’ at Dev Sanskriti Vishwavidyalaya (DSVV) at Haridwar, Uttarakhand Governor Dr. K.K. Paul today (August 7, 2016) said the centre would not only strengthen our cultural ties with Baltic countries but also encourage research and explore our heritage which remained suppressed, both in our country as well as in the Baltic States due to the colonial administration. “This Baltic Centre will help foster and promote joint publications, joint development of learning resources, research activities and exchange of students,” he said.


Dr. Paul highlighted the similarities between some aspects of Indian culture and that of Baltic countries where the oldest Indo-European people in Europe reside. He said Baltic culture also worshipped gods and goddesses of Earth and Nature. The system of worshipping sacred and eternal fire still continues in these countries. “The 14th Century ruler of Lithuania, Gediminas, had decreed that Lithuania must be a land of tolerance,” said the Governor.


The Governor said Indian Civilization was the oldest and a continuous one. All others have had gaps, some vanished completely and some revived. But it is the Indian civilisation which is known to be over five thousand years old. He said the amazing resilience of the Indian civilisation was based on certain eternal truths enunciated in Upanishads which have remained valid at all times. In between, there were severe challenges which were overcome in the eighth century by Adi Shankaracharya, in the 15th and 16th Centuries by the Saint poets, Guru Nanak, Tulsidas, Kabir, Meera Bai, Surdas Chaitanya Mahaprabhu, who showed us the way. “Later, in the 19th Century, we had Brahmo Samaj, Arya Samaj, Prarthna Samaj, besides Sri Ramakrishna and Swami Vivekananda.”


Speaking about Vedanta, he said; “Vedanta is the culmination of knowledge, the sacred wisdom of the Hindu sages, and the transcendental experience of the seers of Truth”. According to Swami Vivekananda; Vedanta promulgates the harmony of religions. As different rivers originate from different sources but mingle in the ocean, losing their names and forms, so all the various religious paths that human beings take, through different tendencies, lead to God, or the Truth.”


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The Governor said that the message of world peace had been conveyed by India to the entire humanity and the greatest need today was to establish harmony amongst all the people of the world and harmonize religion with modern science. He said Indian culture, since ancient times, had encompassed environmental conservation by encouraging nature-worship and rituals which prevent unbalanced exploitation of environment. “Today, when the entire world is facing global warming , such concepts and traditions are becoming more relevant and need to be adopted. These concepts are also found in some ancient Baltic traditions,” he said.


In this context, he quoted the renowned English historian Arnold Toynbee, who made the insightful statement (in 1970) considering India’s role in contemporary history: “Today we are still living in this transitional chapter of the world’s history, but it is already becoming clear that a chapter which had a Western beginning, will have to have an Indian ending, if it is not to end in the self-destruction of the human race.”


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ज्यपाल डाॅ0 कृष्ण कांत पाल ने देव संस्कृति विश्वविद्यालय, हरिद्वार में ‘सेंटर आॅफ बाल्टिक स्टडीज ’ का उद्घाटन किया। मुख्य अतिथि के रूप में अपने सम्बोधन में राज्यपाल ने भारतीय व बाल्टिक देशों की संस्कृति की समानता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि बाल्टिक संस्कृति में भी पृथ्वी व प्रकृति के देवी-देवताओं की पूजा की जाती है। इन देशों में पूजा का पवित्र तरीका आज भी जारी है। उन्होंने कहा कि चैदहवीं सदी में लिथुएनिया के राजा ने आदेशित किया कि लुथियाना को सहनशीलता की धरती होना चाहिए।


उन्होंने कहा कि देव संस्कृति विश्वविद्यालय, हरिद्वार में इस सेंटर के स्थापित होने से न सिर्फ हमारी और बाल्टिक देशों की संस्कृतियों को मजबूती मिलेगी बल्कि हमारी विरासतों को जो हमारे देश व बाल्टिक देशों में औपनिवेशिक काल के कारण दबे रह गए, के लिये अनुसंधानों को प्रोत्साहित करेगा। उन्होंने कहा कि बाल्टिक सेंटर के माध्यम से संयुक्त प्रकाशनों, सीखने के संसाधनों, अनुसंधानिक गतिविधियों एवं छात्रों के आदान-प्रदान को भी संयुक्त रूप से बढ़ावा मिलेगा।


राज्यपाल ने कहा कि भारतीय सभ्यता सबसे पुरानी और सतत् सभ्यता है। अन्य सभी सभ्यताओं में अंतराल रहा है, कुछ पूरी तरह विलुप्त हो गयी है और कुछ पुनर्जीवित हुई हैं लेकिन केवल भारतीय सभ्यता ही है जो पिछले पाँच हजार वर्षों से भी अधिक समय से जीवित है। भारतीय सभ्यता का अद्भुद लचीलापन उपनिषदों के प्रतिपादित कुछ शाश्वत सत्यों पर आधारित है, जो सदैव वैध रहेंगे। पन्द्रहवीं व सोलहवीं सदी में आदि शंकराचार्य व गुरूनानक, संतकवि तुलसीदास, कबीर, मीराबाई, सूरदास, चैतन्य महाप्रभु ने भी बहुत सी चुनौतियों से उबरकर हमारा मार्गदर्शन किया है। बाद में 19वीं सदी में स्वामी रामकृष्ण और स्वामी विवेकानन्द के अतिरिक्त हमारे पास ब्रहम समाज, आर्य समाज व प्रार्थना समाज भी थे।


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वेदान्तों के विषय में कहते हुए उन्होंने कहा कि वेदान्त, हिन्दू संतों के पवित्र ज्ञान व दिव्य अनुभवों के ज्ञान की पराकाष्ठा है। स्वामी विवेकानन्द के अनुसार वेदान्त धार्मिक सद्भाव का प्रचार करता है। जिस प्रकार विभिन्न नदियां विभिन्न स्रोतों से निकलती हैं परन्तु एक ही सागर में मिलने के बाद अपना नाम खोकर एक हो जाती हैं, इसी प्रकार अनेक धर्म, पंथ व इंसान भी विभिन्न प्रवृत्तियों से होकर ईश्वर और सत्य तक पहुँचते हैं।


राज्यपाल ने कहा कि पूरे वैश्विक समाज को विश्वशांति का संदेश भारत द्वारा दिया गया है। और आज की सबसे बड़ी आवश्यकता यही है कि सभी लोगों के मध्य तथा धर्म और विज्ञान के बीच सामंजस्य स्थापित हो। प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति ने प्रकृति की पूजा करके पर्यावरण संरक्षण को प्रोत्साहित किया है। हमारे अनुष्ठान भी पर्यावरण के असंतुलित दोहन को रोकते हैं। उन्होंने कहा कि आज जब सम्पूर्ण जगत भूमण्डलीय ऊष्मीकरण का सामना कर रहा है, ऐसे में हमारी समृद्ध परम्पराएं एवं अवधारणाएं और भी प्रासंगिक होती जा रही हैं, जिन्हें अपनाए जाने की जरूरत है। इस प्रकार की अवधारणाएं प्राचीन बाल्टिक परम्पराओं में भी देखने को मिलती हैं।


इस संदर्भ में, उन्होंनेे प्रसिद्ध अंग्रेजी इतिहासकार आर्नोल्ड टोयन्बी की बात दोहराई, जिन्होंने 1970 में समकालीन इतिहास में भारत की भूमिका पर व्यावहारिक बयान दिया कि ‘‘हम आज भी इतिहास के उस संक्रमणकालीन अध्याय में जी रहे हैं, लेकिन यह स्पष्ट होता जा रहा है कि जो अध्याय पश्चिम में शुरू हुआ था उसका अंत भारत में होगा, यदि यह मानव के आत्मविनाश का अंत नहीं है।’’


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