नरेश खन्ना का हमारे बीच से चले जाना? Naresh Khanna’s death is massive loss to Uttarakhand film industry

नरेश खन्ना का हमारे बीच से चले जाना? Naresh Khanna’s death is massive loss to Uttarakhand film industry


नरेश खन्ना का चले जाना उत्तराखंड की फिल्म इंडस्ट्री के लिए एक दुखद समाचार है। उत्तराखंड के ना होने के बावजूद उन्होंने प्रदेश की फिल्म इंडस्ट्री में बहुत योगदान दिया जिसका उत्कृष्ट उदाहरण है उनके द्वारा बनायीं गयी चार उत्तराखंडी फ़िल्में। नरेश खन्ना के नजदीकी मित्र रहे सुनील नेगी की सभी उत्तराखंडियों की तरफ से उन्हें श्रद्धांजलि…


त्तराखंड की चार बड़े-परदे की सफल फिल्मों के जुनूनी फिल्मकार, काबिल निर्देशक और निर्माता जिसने ‘चक्रचाल’, ‘बँटवारू’, ‘सुभेरु घाम’ और ‘भूली ऐ भूली’ जैसे बेहतरीन क्षेत्रीय फिल्मे निर्देशित कर उत्तराखंड, खासकर गढ़वाली सिनेमा को नयी बुलंदियां दी, का यकायक हमारे बीच से चला जाना ठीक वैसे ही है जैसे हिंदी फिल्म जगत से कमाल अमरोही या राज कपूर का चला जाना।

उत्तराखंड से न होने के बावजूद जिस जूनून, कर्मठता, ईमानदारी और पारदर्शिता के साथ बगैर किसी सरकारी या निजी सहयोग से नरेश खन्ना ने उत्तराखण्डी फिल्मों के साथ न्याय किया उसे किसी भी सूरत में नहीं भुलाया जा सकता। इन सभी फिल्मों में उर्मि नेगी द्वारा निर्मित और नरेश खन्ना द्वारा निर्देशित गढ़वाली फिल्म ‘सुभेरु घाम’ सर्वाधिक चर्चित हुई जबकि उनकी होम प्रोडक्शन ‘भूली ऐ भूली’ भी बेहतरीन नतीजे दे रही है।

यूँ तो उत्तराखंड में अब तक सैकड़ों गढ़वाली और कुमाऊनी सीडी फिल्में बानी हैं और पराशर गौर द्वारा सबसे पहली फिल्म ‘जग्वाल बभी’ बनी लेकिन यदि हम जग्वाल को अपवाद माने तो बड़े परदे की इन चार बेहतरीन फिल्मों को काबिलेतारीफ निर्देशन के पश्चात बिग स्क्रीन उत्तराखण्डी रीजनल फिल्म मेकिंग में नरेश खन्ना ने जिस क्वालिटी फिल्म्स की नयी क्रांति को जन्म दिया उसका कोई सानी नहीं हो सकता।

मशहूर उत्तराखण्डी लोक गायक नरेंद्र सिंह नेगी के मुताबिक: “नरेश खन्ना उत्तराखंड फिल्म निर्देशन के क्षेत्र में वो बेहतरीन तकनीकी समझ वाले निर्देशक थे जिन्होंने बेहतरीन गढ़वाली फिल्मे देकर उत्तराखंड को क्षेत्रीय फिल्म निर्माण के राष्ट्रीय पटेल पर न सिर्फ खड़ा कर दिया बल्कि उत्तराखंड और बहार के प्रोड्यूसरों को भी अब उत्तराखण्डी फिल्मों पर पैसा खर्च करने का जोखिम उठाना शुरू कर दिया, जिसका पहले बेहद अभाव था।”

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नरेश खन्ना (चेक शर्ट में) सुनील नेगी और अपने अन्य प्रशंशको के साथ (फाइल फोटो)

नरेश खन्ना दरअसल किसी जमाने में मशहूर फिल्म एक्टर और प्रोड्यूसर डायरेक्टर मनोज कुमार के अस्सीस्टेन्ट डायरेक्टर हुआ करते थे। उनमे फिल्म-मेकिंग का जस्बा कूट कूट कर भरा था।एक गैर उत्तराखण्डी का यूँ उत्तराखंड की बोली भाषा के संरक्षण, संवर्धन और फिल्म मेकिंग के लिए जुनूनी हद तक काम करना शायद ही कहीं देखने, सुनने को मिलेगा।

ऐसे जुनूनी फिल्म डायरेक्टर की जिसने अपने दिल की तीन नसों के 65 फीसदी ब्लॉकेज के बावजूद अपनी जान जोखिम में डालकर ‘भूली ऐ भूली’ बनायीं। अपने जीवन की सारी पूंजी इस फिल्म के निर्माण में झोंक दी और चिकित्सको की सर्जरी कराने की सलाह को धता बताते हुए हँसते हँसते मौत को गले लगा लिया। वह चाहते तो पहले सर्जरी करा लेते लेकिन गढ़वाली फिल्म निर्माण ‘का जानूँ’ उन्हें बेहद भारी पड़ा और आज एक बेशकीमती सख्शियत से हम हाथ धो बैठे।

ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें। हरी ॐ


sunil negi
Sunil Negi is President of the Uttarakhand Journalist Forum

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