Elections in western UP driven by communal agenda पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ध्रुवीकरण पर टिकी हैं सबकी निगाहें

Elections in western UP driven by communal agenda पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ध्रुवीकरण पर टिकी हैं सबकी निगाहें

Post Muzaffarnagar riots of 2013, communal overtones have driven public discourses and elections. In 2014 Lok Sabha elections, BJP successfully reaped benefits of it. Uttar Pradesh Assembly elections of 2017 see same trend in western districts of the state. As talks of development take backseat, political parties bank on communal polarisation to emerge victorious, writes Sandeep Joshi…


I

n elections in Uttar Pradesh, there are two types of campaigns that are being run side-by-side. On one hand there are customary rhetoric touching the so-called agenda of development where talks revolve around education, health, civic infrastructure et al. And on the other hand it is all about polarization on communal lines.


This is exactly what is happening in majority of the 140 seats in the 26 districts of western Uttar Pradesh that goes to poll on Friday (February 11). Leaders of three major political forces – BJP’s Narendra Modi and Amit Shah; Samajwadi Party-Congress combine’s Akhilesh Yadav and Rahul Gandhi; and BSP’s Mayawati – all are harping on development planks, with occasional mentions of Hindu-Muslim polarization. But the entire contest now seems to be by polarisation on religious lines.


A major part of western Uttar Pradesh, directly and indirectly, bore the brunt of Muzaffarnagar riots in 2013. While some areas of Muzaffarnagar, Shamli and Meerut districts saw exodus of Muslims and Hindu communities post riots, communal tensions in the entire region has become a routine affair now. Examples of it are communal tensions in Bijnor, Masuri, Kairana and Bisada.


It is on these grounds that the elections in the western districts are being fought. In majority of places it is being done covertly, while in some places it is done overtly. The examples of latter are Sardhana, Thana Bhawan, Kairana and Dhaulana. From Sardhana and Thana Bhawan BJP has fielded its sitting MLAs Sangeet Som and Suresh Rana, both Muzaffarnagar riots accused, while from Kairana Mriganka, daughter of sitting BJP MP Hukum Singh is in the fray. These two places were most affected in the riots.


But the peculiar example is that of Dhaulana assembly seat in Hapur district, which is just 50 kms from Delhi, where candidates and their supporters are openly seen seeking votes on communal lines and are banking on religious polarization to secure their win. Dhaulana will witness a three-cornered fight between BJP, SP and BSP where two Tomars, the dominant Thakur community of the region, are pitted against a Muslim, a local strongman.


BJP has fielded its four-time MP from Hapur, Dr Ramesh Chand Tomar, who came into limelight during the Ram Temple movement in the 90s, SP has given ticket to its sitting MLA, Dharmesh Tomar, while BSP is being represented by Aslam Choudhary, who was runner-up in 2012.

uttar-pradesh-opinion-poll-2017Alleging that ‘fatwa’ has been issued to Muslims to support BSP’s Aslam Choudhary, BJP candidate Dr. Ramesh Chand Tomar is openly appealing to ‘Hindu’ voters across various castes to vote for him and not to let Dhaulana seat go into the hands of a Muslim. An FIR has already been registered against him for giving inflammatory speeches. But this has not deterred him from seeking votes on communal lines.


What is happening openly in Dhaulana, is also happening in a discreet and hush-hush manner in other places across constituencies; be it a rural seat in places like Bijnor and Muzzafanagar or in so called modern sub-cities like Noida and Sahibabad. Significantly, division on communal lines is more where BJP nominees are pitted against Muslim candidates from either SP or BSP, or both, compared to assembly segments where there is the contest between all Hindu candidates from the three major parties.


सांप्रदायिक एजेंडा पर केंद्रीत हुआ पश्चिमी उत्तर प्रदेश का चुनाव


पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चुनाव दो समानांतर बिंदुओं पर चल रहा है। एक ओर पंरपरागत विकास का नारा है। इसमें शिक्षा, स्वास्थ्य, ढांचागत निर्माण, नागरिक सेवाओं की बात हो रही है। वहीं दूसरी ओर, मतदाता केवल वोटों के सांप्रदायिक ध्रुवीकरण पर चर्चा कर रहे हैं।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 26 जिलों की 140 सीटों पर सबसे बड़ा मुददा सांप्रदायिकता ही है। चाहे फिर मतदाता इसके पक्ष में हो या फिर विरोध में। यहां पर शुक्रवार 11 फरवरी को मतदान होनाा है। सभी प्रमुख दलों के नेता चाहे फिर वह सपा—कांग्रेस गठबंधन के अखिलेश यादव—राहुल गांधी हों, बसपा की मायावती हों या फिर भाजपा के नरेंद्र मोदी—अमित शाह, सभी विकास की बात तो कर रहे हैं  लेकिन अवसर मिलते ही वह हिंदू—मुसलिम मतों के बिंदु को भी उठाते हैं। इससे समस्त मतदान के सांप्रदायिक रूप लेने की संभावना अधिक होती जा रही है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश का अधिकांश हिस्सा प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से 2013 के मुज्जफरनगर कांड की तपिश से प्रभावित दिख रहा है। दंगों के बाद मुज्जफरनगर, शामली, मेरठ जिला से हिंदू—मुसिलमों का बड़े स्तर पर पलायन हुआ था। हालांकि इनमें से कई परिवार स्थिति कुछ सुधरने पर वापस आ गए थे लेकिन सांप्रदायिक तनाव अब इस क्षेत्र में आम हो गया है। यही वजह है कि बिजनौर, मसूरी, कैराना और बिसाड़ा मेंं एक तनाव हमेशा से देखा जा सकता है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के चुनाव में इस तनाव को हर दल भुनाने की जुगत में लगा है। अधिकतर जगहों पर इसे पर्दे में रखकर राजनीति हो रही है तो कई जगह दल—उम्मीदवार खुलकर इसकी राजनीति कर रहे हैं। जिन जगहों पर खुलकर मतदाताओं से सांप्रदायिक आधार पर साथ आने की बात दल और उम्मीदवार कर रहे हैं उनमें सरधाना, थाना भवन, कैराना और धौलाना शामिल है। सरधाना से भाजपा ने अपने फायरब्रांड नेता संगीत सोम को मैदान में उतारा है। वह मौजूदा विधायक हैं। वहीं थाना भवन से सुरेश राणा इसके उम्मीदवार हैं। दोनों मुज्जफरनगर कांड के आरोपी हैं। वहीं कैराना से भाजपा के सांसद हुकुम सिंह की बेटी मृगांका उम्मीदवार है। हुकुम सिंह ने ही सबसे पहले यहां से हिंदूआो के सामूहिक पलायन का मुददा उठाकर राष्ट्रीय स्तर पर अखबारों मेंं सुर्खिया हासिल की थी। ये दोनों ही दंगों से सर्वाधिक प्रभावित इलाके रहे  थे।

इस इलाके में जहां खुले तौर पर दल—उम्मीदवार धर्म के नाम पर वोट मांग रहे हैं वह धौलाना सीट है। दिल्ली से करीब 50 किमी दूरी पर स्थित इस विधानसभा सीट से भाजपा ने अपने चार बार के सांसद डा. रमेश चंद तोमर को मैदान में उतार है। तोमर के समर्थक खुले तौर पर हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण की बात कर रहे हैं या कहे कि इसी के सहारे वे जीत की उम्मीद भी कर रहे हैं। यहां पर त्रिकोणीय मुकाबला है। ठाकुर बाहुल्य वाले इस  विधानसभा सीट पर सपा, बसपा और भाजपा के बीच टक्कर है। दो दलों ने राजपूतों को टिकट दिया है तो वहीं एक ने मुसलमान उम्मीदवार को मैदान में उतारा है।

भाजपा के रमेश चंद तोमर, जो कि यहां पर राम मंदिर आंदोलन के समय सबसे बड़े नेता के तौर पर उभरे थे, के अलावा यहां से राजपूत वर्ग के ही धर्मेश तोमर भी मैदान में हैं। वह सपा से मौजूदा विधायक हैं और उन पर सपा ने एक बार फिर से दांव लगायाा है। वहीं बसपा ने 2012 के चुनाव में दूसरे स्थान पर आए असलम चौधरी को अपना उम्मीदवार बनाया है।

रमेश चंद तोमर यह आरोप लगा रहे हैं कि मुसलिमों को फतवा जारी किया गया है कि वे बसपा के असलम चौधरी के पक्ष में वोट दें। इसका हवाला देते हुए वह हिंदूओं से खुले आम अपने पक्ष में वोट देने की अपील कर रहे हैं। वह कह रहे हैं कि हिंदूओं को जाति—पाति, वर्ग से उपर उठकर एक साथ आकर उनके पक्ष में वोट करना चाहिए और इस सीट को मुसलमानों के हाथ में जाने से बचाना होगा। उनके उग्र भाषणों को देखते हुए उन पर एफआईआर भी दर्ज हो चुकी है। लेकिन उसके बावजूद उनके तेवर में कोई नरमी दिखाई नहीं देती है।

धौलाना में जो खुले आम हो रहा है वह पश्चिमी उत्तर प्रदेश की अन्य सीटों पर किसी न किसी रूप में चलन में है। बिजनौर और मुज्जफरनगर जैसे ग्रामीण इलाको के साथ ही नोएडा और साहिबाबाद में भी यह सांप्रदायिक कार्ड खेला जा रहा है। खासकर सांप्रदायिक आधार पर यह मतों का ध्रुवीकरण वहां पर हो रहा है जहां पर भाजपा के हिंदू उम्मीदवार और अन्य दलों के मुसलिम प्रत्याशियों के बीच सीधी टक्कर हो रही है।

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