हमारी आत्मा है गैरसैंण, हम बाबा मोहन उत्तराखंडी के बलिदान को खाली नहीं जाने देंगे: पुष्पेश त्रिपाठी UKD committed to make Gairsain Uttarakhand’s Capital

हमारी आत्मा है गैरसैंण, हम बाबा मोहन उत्तराखंडी के बलिदान को खाली नहीं जाने देंगे: पुष्पेश त्रिपाठी UKD committed to make Gairsain Uttarakhand’s Capital

उत्तराखंड क्रांति दल के केन्द्रीय अध्यक्ष पुष्पेश त्रिपाठी ने कर्णप्रयाग विधानसभा सीट पर होने वाले चुनावी दौर में बहुजन समाज पार्टी के प्रत्याशी कुलदीप सिंह कंनवासी की असामयिक मौत पर उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि दी और बाबा मोहन उत्तराखंडी को याद किया जिन्होंने गैरसैंण को राजधानी बनाने के लिये अपने प्राणो की आहुति दे दी।


उत्तराखंड क्रांति दल के केन्द्रीय अध्यक्ष पुष्पेश त्रिपाठी ने कहा कि कर्णप्रयाग विधानसभा सीट उत्तराखंड क्रान्ति दल के लिये बहुत मायने रखती है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि इस जमीन ने हमें राजनीतिक चेतना दी है। जब उत्तराखंड क्रान्ति दल अपने जनांदोलनों के माध्यम से राज्य के सवाल को उठा रहा था तब गैरसैंण हमारे लिये किसी तीर्थ से कम नहीं था। हम अपनी राजनीतिक समझ और विकास के विकेन्द्रीकरण का रास्ता गैरसैंण से ही निकालते थे।


जब 1987 में उत्तराखंड क्रान्ति दल ने अपना पहला घोषणा पत्र जारी किया तो उसमें सबसे पहले गैरसैंण को राजधानी बनाने की बात कही थी। नब्बे के दशक में 14 जनवरी 1992 को पार्टी ने सरयू-गोमती के तट पर उत्तरायणी के अवसर पर अपना ब्लू प्रिंट जारी किया, जिसमें उत्तराखंड राज्य की परिकल्पना को लोगों के सामने रखा गया। राज्य की अवधारणा का सबसे महत्वपूर्ण बिन्दु था राजधानी का। उक्रांद ने कहा कि हम गैरसैंण को राज्य की राजधानी बनायेंगे। इस घोषणा के बाद 24-25 जुलाई 1992 को अपने द्विवार्षिक सम्मेलन में उक्रांद ने पेशावर विद्रोह के नायक वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली के नाम पर गैरसैंण का नाम ‘चन्द्रनगर’ रखा और इसे राज्य की राजधानी घोषित किया।

UKD Pushpesh Tripathi

यहां रामलीला मैदान के पास वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली की आदमकद प्रतिमा के लिये स्थल का शिलान्यास किया। इस अवसर पर उत्तराखंड के अलावा देश के जाने-माने आंदोलनकारी भी उपस्थित थे जिनमें झारखंड मुक्ति मोर्चा के तत्कालीन उपाध्यक्ष और सांसद सूरज मंडल भी शामिल हुये। इसी वर्ष 25 दिसंबर को वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली की सौवीं जयन्ती पर उनकी आदमकद प्रतिमा स्थापित की गई।


इस प्रकार हमने इसे जनता की भावनाओं के अनुरूप ‘पहाड़ की राजधानी पहाड़ में’ के विचार को मूर्त रूप दिया। हमारा मानना था कि गैसैंण को एक नया शहर बनाकर हम इसके आसपास के पचास किलोमीटर के क्षेत्र को विसित कर विकास के विकेन्द्रीकरण रास्ता साफ करेंगे। गैरसैंण को राजधानी बनाने के पीछे हमारा एक ही लक्ष्य था कि कत्यूरों, चंदो, पंवारों से लेकर अंग्रेजों ने पहाड़ में नये शहरों का निर्माण किया। जोशीमठ, बैजनाथ, श्रीनगर, टिहरी, अल्मोड़ा, चंपावत, नैनीताल, मसूरी, लैसंडाउन, देहरादून जैसे शहर विकास के विकेन्द्रीकरण के नमूने थे। अंग्रेजों के जाने के बाद पहाड़ में एक भी नया शहर नहीं बसा। हम गैरसैंण को उत्तराखंड के विकास के विकेन्द्रीकरण नया शहर बनाना चाहते थे। इसलिये हमने इस राज्य की राजधानी के रूप में चुना। हम इसे एक विश्वस्तरीय पर्यटक स्थल के रूप में विकसित करना चाहते थे।


श्री त्रिपाठी ने कहा कि उक्रांद जब राजधानी के सवाल को लेकर एक साफ समझ के साथ आगे आ रहा था तब भाजपा-कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टियां इसके खिलाफ कुचक्र रचने में लग गई। भाजपा जो कभी राज्य आंदोलन की विरोधी रही। उनके सर्वमान्य नेता पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी ने तो इसे राष्ट्रद्रोही मांग तक कहा। बाद में वह एक नये नारे ‘उत्तरांचल’ के नाम से इस आंदोलन को भ्रमित करने के लिये मैदान में आ चुकी थी। उसने राज्य के लिये तो कोई आंदोलन नहीं किया, हां उक्रांद के मुद्दों को हाईजैक करने के षडयंत्र रचने लगी। जब नब्बे के दशक में पूरे देश में रामजन्मभूमि का जलजला आया तो भाजपा भी यहां स्थापित होने लगी।


लेकिन उसका एजेंडा पहाड़ नही था, वह हिन्दुत्व के नाम पर नई तरह की राजनीतिक घुसपैठ करने में कामयाब हुई। कांग्रेस लगतार राज्य के सवाल का विरोध करती रही। आज अपने को सबसे बड़ा आंदोलनकारी बताने वाले प्रदेश के मुख्यमंत्री हरीश रावत राज्य के सबसे प्रबल विरोधी थे, जिन्होंने राज्य आंदोलन को तोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी। यहां तक कि वे कभी हिल कौंसिल तो कभी केन्द्र शासित राज्य के नाम पर जनता को छलते रहे। राज्य में पहली चुनी सरकार के मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी ने तो ऐलान ही कर दिया था कि राज्य उनकी लाश पर बनेगा। दुर्भाग्य से राज्य बनने के बाद सत्ता इन्हीं लोगों के हाथो में आई जो राज्य का विरोध कर रहे थे।


स्थायी राजधानी के मामले में इन दोनों पार्टियों ने हमेशा जनविरोधी रुख अपनाया। इस बीच राजधानी के लिये उत्तराखंड क्रान्ति दल ने लगातार अपना संघर्ष जारी रखा। 1993 में जब उत्तर प्रदेश की तत्कालीन मुलायम सरकार ने राज्य की प्रासंगिकता को समझने के लिये ‘रमाशंकर कौशिक समिति’ की घोषणा की तो उसमें भी राजधानी पर लोगों के विचार मांगे गये। इसमें राज्य के विभिन्न हिस्सों से की गई रायशुमारी में 68 प्रतिशत लोगों ने गैरसैंण को राजधानी बनाने के पक्ष में अपने विचार दिये। जिसे ‘कौशिक समिति’ ने स्वीकार भी किया। राज्य आंदोलन के साथ उक्रांद लगातार गैरसैंण को राजधानी बनाने के लिये लड़ता रहा।


आज से सत्रह साल पहले जब 9 नवंबर 2000 को राज्य बना तो सरकारों की प्राथमिकता बदल गई। पहली अंतरिम सरकार भाजपा की बनी। उसने सबसे पहला काम राजधानी के सवाल को उलझाने का किया। भाजपा ने जनता की भवनाओं को कानूनी सिकंजे में कसने का अलोकतांत्रिक काम किया। हालांकि इस अंतरिम सरकार को इस तरह के आयोग बनाने का कोई अधिकार नहीं था फिर भी उसने ‘राजधानी चयन आयोग’ का गठन कर दिया। जिसे हम ‘दीक्षित आयोग’ के नाम से जानते हैं। बाद में कांग्रेस-भाजपा के शासनकाल में इस आयोग का ग्यारह बार कार्यकाल बढ़ा।


भाजपा के समय भुवनचन्द्र खंडूडी के समय में 2011 में जब इस आयोग ने अपनी रिपोर्ट सदन पटन पर रखी तो जनता भौंचक रह गई। जनता के साथ शायद ऐसा मजाक पहली बार हुआ। दिल्ली के एक काॅलेज में पढ़ने वाले छात्रों के अध्ययन को पटल पर रखा गया। तब मैंने इस परिशिष्ट को सदन में ही फाड़ कर अपनी असहमति जताई थी। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि जो राजनीतिक दल जनता को छलने के लिये राजधानी के सवाल को उलझा रहे थे उनकी पोल-पट्टी भी इस रिपोर्ट में खुल गई। भाजपा-कांग्रेस को अधितर नेताओं ने गैरसैंण के खिलाफ अपना मत दिया था।


इससे पहले जब गैरसैंण को राजधानी बनाने की बात आ रही थी तो आज गैरसैंण का अपनी ढाल बनाने वाले हरीश रावत लगातार राजधानी कालागढ़ या रामनगर बनाने की वकालत करते रहे हैं। आज वे कभी विधानसभा अध्यक्ष गोबिन्दसिंह कुंजवाल तो कभी अपने सांसद प्रदीप टम्टा को आगे कर किसी तरह इस मांग को उलझाये रखना चाहते हैं। विजय बहुगुणा के शासनकाल में गैरसैंण में पहली बारविधानसभा की बैठक कराने के नाटक से लेकर आज तक कांगे्रस यह नहीं बता रही है कि वह स्थायी राजधानी कहां बनायेगी। एक तरफ गैरसैंण में निर्माण चल रहा है, वहीं देहरादून में विधानभवन और अन्य भवनों के लिये सरकार जमीन तलाश रही है।


श्री त्रिपाठी ने कहा कि इस चुनाव में भी गैरसैंण राजधानी का सवाल हमारे घोषणा-पत्र में प्रमुखता से है। गैरसैंण हमारी आत्मा है। हम इसे उत्तराखंड के विकास की कुंजी मानते हैं। कर्णप्रयाग विधानसभा सीट हमारे लिये इसलिये भी महत्वपूर्ण है क्योंकि गैरसैंण इसी विधानसभा के अन्र्तगत आता है चंद्र सिंह गढ़वाली जी की 125 वीं जयंती 25 दिसम्बर 2016 को हमने गैरसैंण में अपना दृष्टिपत्र जारी किया था जिसमें गैरसैंण को राजधानी बनाने को प्रमुखता से रखा गया। हमारे घोषणा पत्र में भी राजधानी का सवाल महत्वपूर्ण है। हम इस चुनाव के माध्यम से कहना चाहते हैं कि गैरसैंण के नाम पर राष्ट्रीय पार्टियों ने जिस तरह से हमें छला है उसका प्रतिकार करने का समय आ गया है।


श्री त्रिपाठी ने जनता का आह्वान करते हुए जनता से गैरसैंण (चन्द्रनगर) को राजधानी बनाने की मुहिम में साथ देंने की बात कही और साथ ही जनता से उक्रांद के कर्णप्रयाग विधानसभा प्रत्याशी बलवंत सिंह नेगी को कुर्सी का बटन दबाकर भारी मतों से विजयी बनाकर विधानसभा में भेजने की अपील की।


श्री त्रिपाठी ने विश्वास दिलाया कि हम गैरसैंण को राजधानी बनाकर दिखायेंगे। यह विश्वास इसलिये भी है कि जब उक्रांद राज्य की बात कर रहा था तब भाजपा-कांग्रेस कह रही थी कि कैसे बनाओगे राज्य हमने बनाकर दिखा दिया। अब ये कह रहे हैं कि गैरसैंण राजधानी नहीं बन सकती, हम कहते हैं कि जनता ने राज्य बनाया जनता ही गैरसैंण को राजधानी बनायेगी। हम बाबा मोहन उत्तराखंडी के बलिदान को खाली नही जाने देंगे।


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