देवभूमि में शराब क्यूँ? It’s time to end the curse of liquor in Uttarakhand

देवभूमि में शराब क्यूँ? It’s time to end the curse of liquor in Uttarakhand

आजकल उत्तराखंड में शराबबंदी की मांग को लेकर कई जगह प्रदर्शन हो रहे हैं जिनमें महिलाएं और बच्चे बढ़-चढ़ के हिस्सा ले रहे हैं। शराब क्यों उत्तरखंड के लिए एक अभिशाप है, कैसे इससे प्रदेश खोखला हो रहा है, और प्रदेश में शराबबंदी के लिए एक बड़ा अभियान क्यों जरुरी है, बता रहे हैं हमारे सहयोगी सरोज आनंद जोशी


जकल पहाड़ में शराबबंदी का मांग जोरो पर है, खासकर महिलाओं के आन्दोलन के बाद और सुप्रीम कोर्ट में नए नियमो के बाद कि हाईवे के इर्द-गिर्द शराब न बिके और खासकर ऐसी सरकार सत्ता में है जो संस्कारो, हिन्दू नैतिक मूल्यों, नारीशक्ति की बात करती रही है उसी संघ यानि आरएसएस के व्यक्ति मुख्यमंत्री पद पर आसीन हैं तो लोगो की उम्मीदें भी बढ़ गई और महिलाओ के प्रचंड समर्थन भी इसी अपेक्षाओ से मिला कि इस बार उत्तराखंड में नयी बयार बहेगी और खासकर एक सशक्त नेत्रत्व मोदी को लोगो ने बड़ी अपेक्षा से वोट किया बिना स्थानीय उम्मीदवारों को देखे वोट किया।

पर यहाँ के मासूम पहाडियों को पता नहीं था पवित्र चारधाम में शराब पर दिए सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ सरकार अपील करेंगी और परिणाम स्वरूप शिव विष्णु माँ गंगा में पावन स्मृति ऋषि-मुनियों की तपस्या की भूमि पर आसुरी संस्कृति का प्रतीक शराब को लागू करने की लिए मशक्कत करेंगी।


आखिर शराब में खराबी क्या है ?
  अक्सर ये दलील दी जाती है कि आखिर शराब में खराबी क्या है? खराबी है तो न पियें! पर पहाड़ में ऐसा नही है यहाँ का आदमी बेहिसाब पीता है इसका केवल एक मनोवैज्ञानिक कारण है ये यहाँ तरह तरह की रूड़ियां अंधविश्वास भावनात्मक समस्याएं फैली हैं ऐसे में बेरोजगारी के बाद अवसाद विषाद का उनको एक ही इलाज आता है ‘शराब’ और को अपने वजूद को मिटा देने तक पीता है, और इसका सबसे अधिक असर उसकी पत्नी बच्चो पर पड़ता है। शराब के नशे में महिलाओ के मारपीट आम बात है। मैंने स्वंय ऐसे गांव देखे हैं जिनमे 30 से 40% औरतें विधवा हो गई क्यूंकि उनके पति शराब की आदी होने के कारण वक़्त के पहले गुजर गए महिलाओ की सुहाग की निशानी मंगलसूत्र तक शराब के खातिर उनके पतियों ने बेच दिए। महिलाओ की दुर्दशा के मुख्य कारण ये कारण ये शराब ही है।

और दूसरा कारण है उत्तराखंड का फौजी बाहुल्य होना है। कम से कम हर तीसरे घर में एक फौजी मिल जायेगा और उनको तो शराब सेवा के दौरान थकान मिटाने को मिलती है। पर उसके शहीद हो जाने के बाद उसकी विधवा/परिजनों को भी शराब का अजीब सा असामाजिक प्रावधान है जिसके कारण हर तीसरे घर में शराब की अनाधिकृत उपलब्धता है। इसके कारण भी नशे की प्रवृति बढ़ जाती है। जमीन में देखा जाए तो पंजाब से अधिक नशे की समस्या उत्तराखंड में है।


शराब क्यूँ जरुरी है:
 
जब शराब से पहाड़ की ये दुर्गति हुई है तो फिर भी शराब का जरुरत क्या है? सबसे बड़ा सवाल ये हैहै इसका सबसे बड़ा कारण है राजस्व का महत्वपूर्ण भाग शराब से आता है, और शराब माफियाओ से यहाँ के जनप्रतिनिधियों के गहरे सम्बन्ध और चुनाव खर्च में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका यही शराबबंदी में अड़चन है। दरअसल ये गलत आंकलन है। ऐसे राजस्व से हम क्या करेंगे जिस राजस्व में पहाड़ की महिलाओ बच्चो की हाय हो, बर्बादी, वेदना हो। पहाडी क्षेत्रो में पर्यटन से मिलाने वाले राजस्व का फायदे का अधिकांश भाग शराब के मालिको तक सीमित हो जाता है और मूल लोगो तक उसका फायदा नहीं मिलता। ‘शराब की एकमात्र राजस्व का श्रोत है’ — हमें इस मानसिकता को दूर करना पड़ेगा।

हमें बिहार से प्रेरणा लेनी होगी। हमारी आर्थिक स्थिति बिहार से बेहतर है। हमारे पास चारधाम है, और अध्यात्मिक द्रष्टि से अधिकांश श्रद्धालु शराब का सेवन वर्जित मानते हैं। पर्यटन, जडी-बूटी, लघु उधोग, छोटी पनबिजली योजनायें, अध्यात्मिक उधोग, सेवा संस्थान, बीपीओ, केपीओ, आईटी हब — इन सब की उत्तराखंड में बहुत संभावनाएं हैं।

जब रामदेव खरबों का व्यवसाय कर सकते हैं तो ऐसे कई उधोग विकसित किये जा सकते हैं। कई विकल्प है, बस चिन्तन नशे शराब से हटाकर पुर्नविचार की आवश्यकता है। वेसे भी इस 17 सालो में खूब शराब बिकी पर पहाड़ वीरान हो गए।

एक रिपोर्ट के अनुसार 3000 गांव खाली, 40,000 परिवार विस्थापित और तीन लाख घरों में ताले लग गए। जब ऐसा विनाश, ऐसा पलायन, ऐसा उजाड़ हो गया तो इसका मतलब है कि ऐसे विकास का मॉडल पूरी तरह से असफल साबित हुआ है इससे अच्छा है दो जून की सूखी रोटी खा लें पर सुख चैन से।


जनभावना, लोकतंत्र और सामाजिक न्याय:
 99.99% महिलाएं शराब नहीं पीती हैं और ना ही चाहती हैं की उनके पति पियें। कोई बच्चा नहीं चाहता वो उसके पिता शराब पियें। कुल मिलाकर 93% जनसख्या नहीं चाहती शराब की बिक्री हो। केवल 7% लोगो के लिए समाज को दूषित किया जाये। ये फिर कैसा और क्या लोकतंत्र है?

महिलाओ से छेड़छाड़, मोटर दुर्घटना, हत्या, चोरी, सामूहिक बलात्कार जैसे जघन्य अपराधो के पीछे 90% कारण शराब की है। इस तथ्य  को ध्यान में रख माननीय न्यायालय ने शराब की दुकानों को  हाईवे के दूर करने की बात कही थे, पर उनको भी पता नहीं था मानव इतना विसिप्त और क्रूर हो चूका है कि उसके भी तोड़ निकल लेगा।ये संविधान के अधिकार सामाजिक न्याय के विरुद्ध भी है। फिर सभ्य समाज में किसके लिए शराब जारी रखी जाए? क्या केवल चंद व्यापारियों अय्यासो आसुरी प्रवृति के लोगो के लिए? जो आदी हो चुके उनके लिए आसानी के पुनरोद्धार गृह बनाये जा सकते हैं एंटी अल्कोहल डोज की जा सकती हैं।


बस अब तय कर ले?
हम उत्तराखंडी अधिकाश लोग हिन्दू धर्म को मानते हैं, सनातन को मानते हैं। भगवान् शिव की तपस्वी स्थली, माँ गंगा की उद्गम का स्थान, भागीरथ से लेकर कई ऋषि मुनियों की तपो भूमि, शिव पुराण से विष्णुःपुराण, वेद वेदांतो, उपनिषदों आदि, शंकारचार्य से लेकर पतंजलि सभी उत्तराखंड हिमालयी भाग उत्तराखंड के प्रसंगों से कहीं न कहीं जुड़े हैं। हम तय कर लें — या तो हम देवताओ को माने, सनातन को माने, या फिर असुरी संस्कृति शराब-सुरा को। युवाओ को सुनहरे सपने भविष्य दें या शराब के जहर का भटकाव, ये तय करने का समय आ गया है। बहुत सारे छद्मो को मिटाने का समय आ गया है। अपना सनातनी हिन्दू होने का छद्म को मिटा दें या फिर अब जरुरत आन पडी है कि देवभूमि की इस दानव रुपी विनाशक शराब को मिटा दिया जाए, देवताओ का सम्मान किया जाए और पहाड़ देवभूमि को पुनर्जीवित किया जाये।


जय देवभूमि; जय भारत !!!


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सरोज आनंद जोशी पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं जिन्होंने काफी समय दिल्ली में गुज़ारा है। पर अपने गाँव और पहाड़ की याद उन्हें वापस उत्तराखंड खींच लायी। वह अब हल्द्वानी में कार्यरत हैं और उत्तराखंड के आर्थिक और सामाजिक विकास ले लिए प्रतिबद्ध हैं।

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